शनिवार, 20 सितंबर 2014

१०. दुष्ट को अंग ~ ४

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१०. दुष्ट को अंग*
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*ज्यौं नर पोषत है निज देह हि,*
*अन्न बिनाश करै तिंहि वारा ।* 
*ज्यौं अहि और मनुष्य ही काटत,* 
*वाहि कछू नहिं होइ अहारा ॥* 
*ज्यौं पुनि पावक जारि सबै कछु,* 
*आपुहु नाश भयौ निरधारा ।* 
*त्यौं यह सुन्दर दुष्ट सुभाव हि,* 
*जानि तजौ किन तीन प्रकारा ॥४॥* 
इस दुष्ट के स्वभाव से परिचित होने के लिये पहले तीन बातें जान लेनी चाहिये; जैसे 
१. मनुष्य अपने देह के पालन –पोषण के लिये दूसरे का हित नष्ट करता है । २. जैसे साँप किसी को काटता है तो उससे उस(सर्प) को कोई खाद्य नहीं मिल जाता है कि उसका पेट भर जाय । और 
३. जैसे अग्नि – किसी का घर जला कर, अन्त में निराश्रय होकर स्वयं भी बुझ जाती है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - दुष्ट के स्वभाव की ये तीन बातें जानकर भी किसने इन तीन बातों को छोड़ दिया है ॥४॥
(क्रमशः)

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