#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*१०. दुष्ट को अंग*
.
*ज्यौं नर पोषत है निज देह हि,*
*अन्न बिनाश करै तिंहि वारा ।*
*ज्यौं अहि और मनुष्य ही काटत,*
*वाहि कछू नहिं होइ अहारा ॥*
*ज्यौं पुनि पावक जारि सबै कछु,*
*आपुहु नाश भयौ निरधारा ।*
*त्यौं यह सुन्दर दुष्ट सुभाव हि,*
*जानि तजौ किन तीन प्रकारा ॥४॥*
इस दुष्ट के स्वभाव से परिचित होने के लिये पहले तीन बातें जान लेनी चाहिये; जैसे
१. मनुष्य अपने देह के पालन –पोषण के लिये दूसरे का हित नष्ट करता है । २. जैसे साँप किसी को काटता है तो उससे उस(सर्प) को कोई खाद्य नहीं मिल जाता है कि उसका पेट भर जाय । और
३. जैसे अग्नि – किसी का घर जला कर, अन्त में निराश्रय होकर स्वयं भी बुझ जाती है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - दुष्ट के स्वभाव की ये तीन बातें जानकर भी किसने इन तीन बातों को छोड़ दिया है ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें