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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” १६/१७)*
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*श्री दादूवाणी की महिमा -*
स्वामीजी की गिरा सुनी, सावधान शिष्य गुनी,
निर्भय गरीबदास पंथ दृढ पाज है ।
हाथ जोड़ नाये शीश, अरज सुनहु ईश,
बानो भेष देहु गुरु पंथ संत साज है ।
आप कही मोर मत, छिपे न छिपाये कित,
लावहू बनाय करि, सो ही सिरताज है ।
मोहन गरीबदास टीला जी इकंत जाय,
वसन बनायो भेष धर्म की जहाज है ॥१६॥
गुरुदेव के वचन सुनकर शिष्य निर्भय हो गये । सावधान गुणी शिष्यों ने गुरुदेव के उपदेश शब्दों का संग्रह कर लिया । प्रसंग प्रकरण के अनुसार उनका अनुबन्ध किया । इस तरह संग्रहीत गुरुवाणी ब्रह्म पथ की दृढ़ पाज(मर्यादा) बनी । तत्पश्चात् गरीबदासजी आदि शिष्यों ने हाथ जोड़कर निवेदन किया - हे गुरुदेव ! आपके पथ का कुछ बाना - भेष भी होना चाहिये, जिससे संत समाज की पहिचान रह सके । तब गुरुदेव ने फरमाया - मेरे मत से अनुयायी कहीं भी छिपे नहीं रहेंगे । समाज में उनकी पहिचान सहज ही उजागर हो जावेगी । फिर भी तुम लोगों की जैसी इच्छा हो, वैसी वेशभूषा बनाकर ले आओ । मैं उसे ही धारण कर लूंगा । तब मोहनदास, गरीबदास और टीलाजी ने एकांत में जाकर अपनी मति, रुचि अनुसार वस्त्र बनाये, और धर्म की जहाज स्वरूप गुरुदेव को लाकर अर्पित किये ॥१६॥
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*श्री दादूपंथ भेष पहिचान -*
चोला जु गरीबदास, टोपी लाये मोहनदास,
टीलाजी कपाली टोपी शिर तें विशेषिये ।
तीनूं भेष लाय करि, गुरु पद भेंट धरि,
स्वामीजी निहार कहे, छिपे नहिं भेषिये ।
जटा जूट तपो वेश, सिर ते उतारे केश,
शिष्यन्ह को सौंप देत श्वेत बाल पेखिये ।
स्वामी जी सुस्नान करें, चोला टोपी नये धरें,
हंस ज्यूं उज्ज्वल भेष शिष्य हर्ष देखिये ॥१७॥
गरीबदास जी एक चोला बनाकर लाये, मोहनदास जी टोपी, और टीलाजी कपाली टोपी बनाकर लाये । तीनों ने अपने - अपने वस्त्र गुरुचरणों में लाकर भेंट किये । तब स्वामीजी ने देखकर कहा - यह भेष सम्पूर्ण समाज में अलग दिखाई देगा, जिससे दादूपंथी साधु कहीं नहीं छिपेगा । तत्पश्चात् गुरुदेव ने तपस्वियों जैसा जटाजूट उतार दिया, अपने शिर के श्वेत केशों की जटा उतार कर शिष्यों को दे दी । स्नान करके नवीन चोला - टोपी धारण कर लिये । उस समय उनका स्वरूप हंस के समान उज्ज्वल भाषित होने लगा, जिसे देखकर सभी शिष्य हर्ष गद्गद हो गये ॥१७॥
(क्रमशः)

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