रविवार, 12 अक्टूबर 2014

*हरि विश्वास*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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फिर राजा मानसिंह ने कहा - आपके शिष्य तो बहुत हो गये हैं और बिना याचना देने पर भी नहीं लेते तब निर्वाह कैसे होगा ? आप धाम, ग्राम, धन नहीं स्वीकार करें तो प्रति दिन खाने पीने की सामग्री भेजने का प्रबन्ध कर दिया जाय । तब दादूजी ४७ का पद -
४७. विश्वास । नटताल
साहिबजी सत मेरा रे, 
लोग झखैं बहुतेरा रे ॥टेक॥
जीव जन्म जब पाया, 
मस्तक लेख लिखाया रे ॥१॥
घटै बधै कुछ नांही, 
कर्म लिख्या उस माहीं रे ॥२॥
विधाता विधि कीन्हा, 
सिरज सबन को दीन्हा रे ॥३॥
समरथ सिरजनहारा, 
सो तेरे निकट गँवारा रे ॥४॥
सकल लोक फिर आवै, 
तो दादू दीया पावै रे ॥५॥
उक्त पद सुनाकर अपना हरि विश्वास व्यक्त किया ।
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और पद ४८ -
४८. राज विधाधर ताल
पूर रह्या परमेश्वर मेरा, 
अणमांग्या देवै बहुतेरा ॥टेक॥
सिरजनहार सहज में देइ, 
तो काहे धाइ माँग जन लेइ ॥१॥
विश्वंभर सब जग को पूरै, 
उदर काज नर काहे झूरै ॥२॥
पूरक पूरा है गोपाल, 
सबकी चिंत करै दरहाल ॥३॥
समर्थ सोई है जगन्नाथ, 
दादू देख रहे संग साथ ॥४॥
उक्त पद सुनाकर अपने हरि विश्वास की दृढ़ता का परिचय दिया ।

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