गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

= एक विं. त. ३५/३६ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” ३५/३६)*
एक समै गुरु की चवकी पर, 
बारिस होवत देखि उठाई । 
टीलहु ल्यावत बेगि संभालहि, 
फूल यथा हलकी तिन पाई । 
स्नान कियो गुरु पादुक तां धरि, 
रज्जब ताहिं उठावन आई । 
जोर लगावत नाहिं उठी वह, 
भारि भई चक्की अधिकाई ॥३५॥ 
एक बार गुरुदेव श्री दादूजी की स्नान चौकी पर वर्षा होते देखकर शिष्य टीलाजी ने उसे उठाकर सुरक्षित स्थान पर लाकर रखा । उस समय टीलाजी को वह चौकी फूल के समान हल्की लगी । फिर एक बार स्नान के पश्‍चात् गुरुदेव की पादुकायें उस चौकी पर धरी हुई थीं, तब रज्जबजी उसे उठाने लगे, किन्तु अत्यन्त जोर लगाने पर भी उसे नहीं उठा पाये । चौकी अत्यन्त भारी हो गई । इस तरह गुरुदेव ने लघिमा और गरिमा सिद्धि का चमत्कार शिष्य संतों को दिखाया ॥३५॥ 
*रज्जब जी अजान बाहु थे भीम सैन जैसे, शिष्य गण रात्री विश्राम पांच घड़ी करते -* 
संत उठें सब ब्रह्म मुहूर्तहिं, 
शौच रु स्नान करें तिहिं वारी । 
प्रातहिं ध्यान हरि गुण गावत, 
फेर कथा सुनि शब्द उचारी । 
मध्य दिने पुनि पाय प्रसादहिं, 
श्री गुरु के जु भण्डार मंझारी । 
आरति साँझ सबै मिलि गावत, 
पंच घड़ी पुनि शयन विचारी ॥३६॥ 
सभी संत ब्रह्म मुहूर्त में उठते, स्नान - शौचादि से निवृत्त होकर प्रात: ध्यान करते, श्री हरि का गुणगान करते, फिर ज्ञान कथा सुनकर भक्ति वैराग्य परक शब्द गाते । तत्पश्‍चात् मध्यान्ह में श्री गुरु भण्डारे में जाकर एक बार अन्न प्रसाद पाते । कुछ विश्राम के पश्‍चात् सायंकालीन आरती में सभी मिलकर निरंजन ब्रह्म की स्तुति करते । भजनानन्दी सभी संत रात्रि में केवल पाँच घड़ी ही शयन करते थे ॥३६॥ 
(क्रमशः)

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