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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*माखूजी*
२३१. समता ज्ञान । ललित ताल
बाबा, कहु दूजा क्यों कहिये,
तातैं इहि संशय दुख सहिये ॥टेक॥
यहु मति ऐसी पशुवां जैसी,
काहे चेतत नांहीं ।
अपना अंग आप नहिं जानै,
देखै दर्पण मांही ॥१॥
इहि मति मीच मरण के तांई,
कूप सिंह तहँ आया ।
डूब मुवा मन मरम न जाना,
देखि आपनी छाया ॥२॥
मद के माते समझत नांहीं,
मैगल की मति आई ।
आपै आप आप दुख दीया,
देखी आपनी झांई ॥३॥
मन समझे तो दूजा नांहीं,
बिन समझे दुख पावै ।
दादू ज्ञान गुरु का नांहीं,
समझ कहाँ तैं आवै ॥४॥
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आमेर में एक दिन माखूजी नामक सज्जन ने दादूजी से पू़छा - स्वामिन् ! संसार में रहते हुये प्राणी को सुख कैसे मिल सकता है ? दादूजी ने कहा - एकात्मक भाव से संसार में रहते हुये भी सुख प्राप्त हो सकता है । माखूजी ने कहा - जब प्रत्यक्ष में सब भिन्न भिन्न भास रहे हैं, तब एकात्मक भाव कैसे हो सकता है ?
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तब दादूजी ने २३१ का पद - बाबा कहू दूजा क्यों किहये, तातैं इहि संशय दुख सहिये ॥ इस उक्त पद से जब उनको समझाया तब उन्होंने कहा - जिस तत्व के जानने से अद्वैत स्थिति प्राप्त होती है, उस तत्व का स्वरूप भी समझाने की कृपा अवश्य करें ।
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तब दादूजी ने २२७ का पद -
२२७. वस्तु निर्देश निर्णय ।
मल्लिका मोद ताल
ऐसा तत्त्व अनुपम भाई,
मरै न जीवै, काल न खाई ॥टेक॥
पावक जरै न मार्यो मरई,
काट्यो कटै न टार्यो टरई ॥१॥
आखिर खिरै न लागै काई,
सीत घाम जल डूब न जाई ॥२॥
माटी मिलै न गगन विलाई,
अघट एक रस रह्या समाई ॥३॥
ऐसा तत्त्व अनुपम कहिये,
सो गहि दादू काहे न रहिये ॥४॥
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यह पद सुनाया फिर वे दादूजी के शिष्य होकर दादूजी के पास ही कु़छ समय तक साधन करते रहे फिर राजस्थान के हाडोती प्रदेश की चम्बल नदी के तट पर गंगायचा ग्राम में स्थायी रूप से रहकर भजन करने लगे थे । ये ५२ शिष्यों में हैं ।
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