गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

बाहर दादू भेष बिन

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
बाहर दादू भेष बिन, भीतर वस्तु अगाध ।
सो ले हिरदै राखिये, दादू सन्मुख साध ॥ 
दादू सब देखैं अस्थूल को, यहु ऐसा आकार ।
सूक्ष्म सहज न सूझई, निराकार निरधार ॥ 
दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।
बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥

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