रविवार, 12 अक्टूबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
१८. विरह विलाप विनती । द्वितीय ताल ~
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तो लग जनि मारे तूँ मोहि, 
जो लग मैं देखूं नहिं तोहि ॥टेक॥
अब के बिछुरे मिलन कैसे होइ, 
इहि विधि बहुरि न चिन्है कोइ ॥१॥
दीन दयाल दया कर जोइ, 
सब सुख आनंद तुम्ह तैं होइ ॥२॥
जन्म - जन्म के बन्धन खोइ, 
देखन दादू अहिनिशि रोइ ॥३॥
टीका ~ हे समर्थ परमेश्‍वर ! आप हमको तब तक नहीं मारना, जब तक हम आपके दर्शन नहीं कर लें । 
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इस मनुष्य देह में आपसे विछुड़ जायेंगे, तो फिर अन्य शरीरों में तो आपसे मिल ही कैसे सकते हैं ? हमारे मन, इन्द्रियाँ आदिक कोई भी आपको नहीं जान सके । 
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हे दीन - दयाल ! आप दया करोगे, तभी हम विरहीजन आपका दर्शन कर सकेंगे । और फिर हमको आपके आनन्द स्वरूप से परिचय होते ही सब प्रकार का सुख प्राप्त होगा । 
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हे नाथ ! हम अपने जन्म - जन्मान्तरों के कर्म - बन्धनों को आपकी कृपा से काट देंगे । इसलिए हे प्रभु ! आपके व्यापक स्वरूप के दर्शनों के लिये हम रात - दिन रुदन कर रहे हैं ।
विरही प्राण चकोर है, विरहा अगनि अंगार ।
रज्जब जारै और को, उनके प्राण अधार ॥१८॥
(क्रमशः)

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