गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

= १४५ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू साधु जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व ।
दुनी दुखी हम देखतां, साधुन सदा आनन्द ॥ 
दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग ।
यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥ 
दादू मीठा पीवै राम रस, सो भी मीठा होइ ।
सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥ 
दादू पाया प्रेम रस, साधु संगति मांहि ।
फिरि फिरि देखे लोक सब, यहु रस कतहूँ नांहि ॥ 
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साभार : Shree Krishna ~

एक अंधकार-पूर्ण रात्रि में एक व्यक्ति नदी में कूदकर आत्महत्या करने का विचार कर रहा था !वर्षा के दिन थे और नदी पूर्ण पर थी; आकाश में बादल घिरे थे और रह-रहकर बिजली चमक रही थी ! वह व्यक्ति उस देश का बहुत धनी व्यक्ति था लेकिन अचानक घाटा लगा और उसकी सारी संपत्ति चली गई ! उसके भाग्य का सूरज डूब गया था और उसके समक्ष अंधकार के अतिरिक्त और कोई भविष्य नहीं था ! ऐसी स्थिति में उसने स्वयं को समाप्त करने का विचार कर लिया था !
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वह नदी में कूदने के लिये जैसे ही चट्टान के किनारे पर पहुंचने को हुआ कि दो बूढ़ी लेकिन मजबूत बांहों ने उसे रोक लिया !तभी बिजली चमकी और उसने देखा कि एक वृद्ध साधु उसे पकड़े हुए है !उस वृद्ध ने उससे इस निराशा का कारण पूछा और सारी कथा सुनकर वह हंसने लगा और बोला -तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे ? वह व्यक्ति बोला - हाँ मेरा भाग्य-सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था और अब सिवाय अंधकार के मेरे जीवन में और कुछ भी शेष नहीं है !
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वह वृद्ध फिर हंसने लगा और बोला - दिन के बाद रात्रि है और रात्रि के बाद दिन; जब दिन नहीं टिकता तो रात्रि भी कैसे टिकेगी ? परिवर्तन प्रकृति का नियम है ठीक से सुन लो जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे और जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है वह सुख में सुखी नहीं होता और दुख में दुखी नहीं ! उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भांति हो जाता है जो वर्षा और धूप में समान ही बनी रहती है !
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सुख और दुख को जो सम-भाव से ले समझ लो कि उसने स्वयं को जान लिया क्योंकि स्वयं की पृथकता का बोध ही सम-भाव को जन्म देता है ! सुख-दुख आते और जाते हैं जो न आता है और न जाता है वह है स्वयं का अस्तित्व; इस अस्तित्व में ठहर जाना ही समत्व है ! जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है उसका जीवन बंधनों से मुक्त हो जाता है !

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