गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

= १४४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
दादू नैनहुँ आगे देखिये, आत्म अंतर सोइ । 
तेज पुंज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होइ ॥ 
अनहद बाजे बाजिये, अमरापुरी निवास । 
जोति स्वरूपी जगमगै, कोइ निरखै निज दास ॥ 
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साभार : Osho Osho Prem Sandesh
धन 
मैंने सुना है। दो आदमी भीड़-भाड़ वाले बाजार में पगडंडी पर साथ-साथ चल रहे थे। अचानक एक चिल्लाया, "सुनो झींगुर की मधुर आवाज !' लेकिन दूसरे ने नहीं सुना। उसने अपने साथी से पूछा इतने लोग और ट्रेफिक के बीच उसे झींगुर की आवाज का कैसे पता चला। पहले व्यक्ति ने स्वयं को प्रकृति की आवाज सुनने में प्रशिक्षित किया था, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। 
"हम सुनते हैं,' वह बोला, "जो हम सुनना चाहते हैं।'
यहां ऐसे लोग हैं जो जमीन पर गिरे सिक्के की आवाज ही सुन सकते हैं--यही उनका एक मात्र संगीत है। बेचारे लोग ! वे सोचते हैं कि वे धनी हैं, लेकिन वे गरीब लोग हैं, जिनका सारा संगीत सिक्के के जमीन पर गिरने की आवाज मात्र है। बहुत गरीब लोग...भूखे। उन्हें नहीं पता कि जीवन में कितना कुछ होता है। उन्हें अनंत संभावनाओं के बारे में कुछ पता नहीं, उन्हें नहीं पता कि कितनी स्वर माधुर्य से भरी धुनों से तुम घिरे हो--बहु आयामी समृद्धियां। तुम वही सुनते हो जो सुनना चाहते हो। 
ओशो।

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