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॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
१०. विरह विलाप । पंचमताल ~
विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥
विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ १ ॥
नव - सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ २ ॥
देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ ३ ॥
दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ ४ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! विरहीजन भक्तों को ऊपर का भेष - बाना टीप - टाप आदि प्रिय नहीं लगते हैं । इस संसार में कोई ऐसा सतगुरु है, जो हम विरहीजनों को राम से मिला देवे । हम आंखों में अंजन, दाँतों में मंजन, स्नान करना, वस्त्रों का धारण करना आदि, सब उस पीव के वियोग में भूल गये हैं । यह विरह का दर्द रात - दिन हमारे शरीर मैं व्याप रहा है । जैसे पतिव्रता स्त्री पति - वियोग में(९+७=१६) सोलह श्रृंगार भूल जाती है, वैसे हम भूल गये हैं । कोई है ऐसा, जो हमारी विरह की पीड़ा को मिटावे । अब हम विरहीजनों को न तो शरीर की सुध है और न घर आदि की ही सुध है । रात और दिन जैसे पपैया स्वाति नक्षत्र की बूंद के लिये पुकारता है, वैसे ही हम विरहीजन परमेश्वर के दर्शनों के लिये पुकार रहे हैं । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि विरहीजनों को परमात्मा के सिवाय और कोई भी प्रिय नहीं लगता है । राम के बिना विरहीजन, मृतक की तरह, सम्पूर्ण चेष्टा रहित हो चुके हैं ।
जैसे नारी नाह बिन, भूलि सकल श्रृंगार ।
त्यूं रज्जब भूला सकल, सुन स्नेही दिलदार ॥ १० ॥
यत्प्राप्य न किंचिद् वांछति न शोचति ।
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति ॥(नारद सूत्र)
( प्रेमाभक्ति में इच्छा, शोक, द्वेष, राग व चंचलता नहीं रहती है)
छन्द
नीर बिना मीन दुखी, खीर बिना शिशु जैसे,
पीर जाके औषधि ना कैसे रह्यो जात है ।
चातक ज्यों स्वाति बूँद, चन्द को चकोर जैसे,
चन्दन की चाह कर, सर्प अकुलात है ॥
निर्धन ज्यूं धन चाहै, कामिनी कूँ कंत चाहै,
ऐसी जाके चाह ताकूँ कछु न सुहात है ।
प्रेम को प्रभाव ऐसो, प्रेम तहाँ नेम कैसो,
‘सुन्दर’ कहत यह प्रेम ही की बात है ॥ १० ॥
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