शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

= द्वि विं. त. १/२ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” १/२)*
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*छप्पय* 
*श्री दादूजी को विराज मान करने से राजा का चौतरफा यश फैल गया -* 
भूप नित प्रति भजत संतहिं, राम रटि रसना गुनी । 
दिपै सूरज वंश उज्ज्वल, नगर शोभित जन धनी । 
भूप यश विख्यात जानत, संत सेवक सब दुनी । 
संत निज पुर लाय थरपे, धन्य नारायण धनी ॥१॥ 
राजा नारायण सिंह सदैव संत सेवा में तत्पर रहते, और जिह्वा से निरन्तर राम नाम रटते रहते । सूर्यवंश में उत्पन्न राजा अपने सद्गुणों से उज्ज्वल हो गये । उनके राज्य नगर में सम्पूर्ण जनता सुख अनुभव करती थी । राजा का यश संत सेवा के कारण जगत् में विख्यात हो गया । संत श्री दादूजी को लाकर अपने नगर में विराजमान करने से राजा धन्य हो गया ॥१॥ 
*राजा उवाच श्री दादूजी की महिमा -* 
नमो श्री गुरुदेव दादू, चरण पंकज नागरा । 
दिपै तपमय तेज शोभा, संत गुण सुखसागरा । 
पंथ दादू ब्रह्मगामी, गिरा अनुभव उच्चरा । 
सर्वदर्शन में शिरोमणि, सार रूप उजागरा ॥२॥ 
राजा प्रतिदिन आकर गुरुदेव श्री दादूजी की वन्दना करता - हे गुरुदेव! आपके चरण कमलों में मेरा नमस्कार अर्पित है । नागर ब्राह्मण कुल में अवतार लेने वाले आपका तप और तेज सूर्यवत् देदीप्यमान हैं । आपमें संतों के सभी गुण सुशोभित है । भक्तों के लिये आप सुखों के सागर हैं । आपका भजन - साधन पंथ ब्रह्मगामी है, ब्रह्म की प्राप्ति कराने वाला है । आप द्वारा फरमाई गई अनुभव वाणी सम्पूर्ण दर्शन शास्त्रों का सार है । आपको बार - बार नमस्कार है ॥२॥ 
(क्रमशः)

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