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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत ।
आपा पर एकै भया, छूटी सब हि भरन्त ॥७६॥
(साधु अंग १५)
सुरती रूप शरीर का, पिव के परसे होय ।
दादू तन मन एक रस, सुमिरन कहिये सोय ॥१६१॥
(परिचय अंग ४)
टौंक में लौंग प्रसाद वितरण के पश्चात् टीलाजी ने दादूजी से पू़छा - आपने एक क्षण में इतने समुदाय को प्रसाद कैसे बाँट दिया ? फिर वैष्णवी में तो प्रसाद के विषय में विवाद भी चलता है । महन्त, संत, आचार्य दूसरों के हाथ से लेते ही नहीं हैं । तब दादूजी ने उक्त साखियां कही थीं ।
कहा भी है - द्वैत भाव दुविधा मिटी, सुखो भये सब संत ।
टौंक महोत्सव कारणे, दादू भये अनन्त ॥
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३०८. भ्रम विध्वंसन । एक ताल
साधो ! हरि सौं हेत हमारा, जिन यहु कीन्ह पसारा ॥टेक॥
जा कारणि व्रत कीजे, तिल तिल यहु तन छीजे ।
सहजैं ही सो जाना, हरि जानत ही मन माना ॥१॥
जा कारणि तप जइये, धूप सीत सिर सहिये ।
सहजैं ही सो आवा, हरि आवत ही सचु पावा ॥२॥
जा कारण बहु फिरिये, कर तीरथ भ्रमि भ्रमि मरिये ।
सहजैं ही सो चीन्हा, हरि चीन्ह सबै सुख लीन्हा ॥३॥
प्रेम भक्ति जिन जानी, सो काहे भरमै प्राणी ।
हरि सहजैं ही भल मानैं, तातैं दादू और न जानैं ॥४॥
टौंक में उक्त चमत्कारों को देखकर कु़छ संतों ने दादूजी से कहा - माधवकाणी पर आपका अधिक स्नेह हैं । संतों के उक्त वचन को सुनकर दादूजी ने उक्त ३०८ का पद कहा था । उक्त पद को सुनकर वैष्णव संतों ने दादूजी से पू़छा - यह ज्ञान आपको किस गुरु ने दिया था ? तब दादूजी ने कहा - अहमदाबाद के कांकरिया तालाब पर मेरे गुरु वृद्ध भगवान् ने दिया था ।
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फिर २४१ का पद -
२४१. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल
मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै ।
काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥टेक॥
अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये ।
परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥१॥
मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला ।
अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥२॥
धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा ।
शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥३॥
अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता ।
ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥४॥
सुनाया था,
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फिर २४२ का पद -
२४२. राज विद्याधर ताल
मेरा गुरु आप अकेला खेलै ।
आपै देवै आपै लेवै, आपै द्वै कर मेलै ॥टेक॥
आपै आप उपावै माया, पंच तत्त्व कर काया ।
जीव जन्म ले जग में आया, आया काया माया ॥१॥
धरती अंबर महल उपाया, सब जग धंधै लाया ।
आपै अलख निरंजन राया, राया लाया पाया ॥२॥
चन्द सूर दोइ दीपक कीन्हा, रात दिवस कर लीन्हा ।
राजिक रिजक सबन को दीन्हा, दीन्हा लीन्हा कीन्हा ॥३॥
परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा ।
दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥४॥
यह पद सुनाया ।
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फिर ११२ का पद -
११२. गुरुमुख कसौटी । ललित ताल
भाई रे, भानै घड़ै गुरु मेरा, मैं सेवक उस केरा ॥टेक॥
कंचन कर ले काया, घड़ घड़ घाट निपाया ॥१॥
मुख दर्पण मांहि दिखावै, पीव प्रकट आन मिलावै ॥२॥
सतगुरु साचा धोवै, तो बहुरि न मैला होवै ॥३॥
तन मन फेरि सँवारै, दादू कर गहि तारै ॥४॥
सुनाया । उक्त ४ पद सुनकर संत अति प्रसन्न हुये थे ।
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