मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

= १३ =

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
१३. केवल विनती । गजताल ~ 
राम सँभालिये रे, 
विषम दुहेली बार ॥टेक॥ 
मंझ समंदां नावरी रे, 
बूडे खेवट - बाज । 
काढनहारा को नहीं, 
एक राम बिन आज ॥१॥ 
पार न पहुँचै राम बिन, 
भेरा भवजल मांहि । 
तारणहारा एक तूँ , 
दूजा कोई नांहि ॥२॥ 
पार परोहन तो चले, 
तुम खेवहु सिरजनहार । 
भव सागर में डूब है, 
तुम्ह बिन प्राण अधार ॥३॥ 
औघट दरिया क्यों तिरे, 
बोहिथ बैसणहार । 
दादू खेवट राम बिन, 
कौण उतारे पार ॥४॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हे राम ! इस विकट समय में आप हमको संभालो, क्योंकि संसार - समुद्र के बीच में यह हमारी मनुष्य देह रूपी नौका, मायावी जल के भँवर में फँस रही है । खेवटिया के बिना यह डूबने वाली हो रही है । इस नौका को उबारने वाला आपके सिवाय दूसरा और कोई भी नहीं है । 
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हे राम ! आपके बिना यह हमारी नौका इस समुद्र से पार होना असम्भव है । यह हमारा मनुष्य देह रूपी बेड़ा, विषय - वासना रूपी जल में डूब रहा है । इस समय इसको तारने वाले आप ही हो, आपके सिवाय दूसरा कोई नहीं दिखाई दे रहा है । 
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हे सिरजनहार ! आप खेवो तो यह ‘परोहन’ - मनुष्य देह रूपी हमारी नौका पार होवेगी । हे प्राणाधार ! संसार - समुद्र में हम आपके बिना डूबे जा रहे हैं । हे नाथ ! यह दरियाव बड़ा भारी है । 
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‘औघट’ कहिए, काम - क्रोध आदि बड़े - बड़े तूँफानों में यह हमारी ‘बोहित’= मनुष्य देह रूपी नौका, डूबने वाली हो रही है । हे राम ! आप ही इस नौका को खेने वाले हो । आपके बिना दूसरा और हमको कोई भी नहीं दीखता है, जो इस नौका को पार करे । 
सकल पतित पावन किये, अधम उधारनहार । 
बिरद बिचारो बाप जी, जन रज्जब की बार ॥१३॥ 
रज्जब टेरै रात दिन, क्यों बोलै नहीं कंत । 
कै तुम अब मौनी भये, कै तुम चाहो अंत ॥१३॥
(क्रमशः)

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