मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

= द्वि विं. त. ७/८ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” ७/८)*
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*भजन साल में प्राचीन ॠषि मुनि और देवता -* 
संत सम्वाद निशा भर भीतर, 
ब्रह्महिं ज्ञान विचार कहाई । 
ज्योति स्वरूप दिपैं सब सिद्धजु, 
बाहर टील जु देखि रहाई । 
प्रात हिं होत प्रणाम किये सब, 
अन्तर ध्यान भये सब जाई । 
टीलजु दौरि गहे गुरु के पद, 
रैन संवाद भयो जु बताई ॥७॥ 
सम्पूर्ण रात्रि सिद्धि संतों और देवों का संवाद होता रहा । उनकी उपस्थिति से पर्णकुटी में दिव्य प्रकाश झलक रहा था । ज्योतिर्मय सिद्ध संतों और देवों की उपस्थिति को बाहर बैठे शिष्य टीलाजी देखते रहे । प्रात: होने पर सभी सिद्ध और देव प्रणाम अभिवादन करके अन्तर्ध्यान हो गये, तब टीलाजी ने दौड़कर गुरुदेव के चरणों को पकड़ लिया, और रात्रि संवाद के विषय में पूछने लगे सभी शिष्य लोग चरणों में गिर गये । तब श्री दादूजी ने उत्तर दिया.... 
*श्री दादू वाणी का शब्द* 
आज हमारे रामजी साधु घर आये, 
मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥टेक॥ 
चौक पुराऊँ मोतियां, घिस चंदन लाऊँ । 
पंच पदारथ पोइ के , यहु माल चढ़ाऊँ ॥१॥ 
तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे । 
शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥२॥ 
भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे । 
सेवा वंदन आरती, यहु लाहा लीजे ॥३॥ 
भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया । 
दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥४॥ 
आप दया करि बात कही सब, 
पूरब संत देव सिध आई । 
ज्ञान विचार भयो तिनके संग, 
दीन दयालजु नाम बताई । 
मोर स्वरूप है षट्मास हिं, 
संत सचेत किये सुधि लाई । 
यों सुनि वाचक होत उदास जु, 
टीलहु को बिरहा झुलसाई ॥८॥ 
तब श्री दादूजी ने दया करके सम्पूर्ण वार्ता बताते हुये फरमाया - पूर्वकाल के सिद्ध संत और देव ज्ञान चर्चा के लिये रात्रि को पधारे थे । उन संतों के नाम बताते हुये गुरुदेव ने कहा कि - ये संत मुझे सचेत करने आये थे कि - अब मेरा स्वरूप छ: मास तक ही और विद्यमान रहेगा । ऐसे वचन सुनकर टीलाजी उदास हो गये । गुरुदेव के भावी विरह को जानकर उनका मन झुलस सा गया ॥८॥ 
(क्रमशः)

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