गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014



॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग*
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*श्वान कहूं कि श्रृगाल कहूं कि,*
*बिडाल कहूं मन की मति तैसी ।*
*ढ़ेढ़ कहूं किधौं, डूम कहूं किधौं,*
*भांड कहूं कि भंडाइ दे जैसी ।* 
*चौर कहूं, वटपार कहूं,*
*ठग जाइ कहूं, उपमा कहुं कैसी ।* 
*सुन्दर और कहा कहिये अब,*
*या मन की गति दीसत ऐसी ॥११॥* 
*इसकी किससे तुलना हो* : मैं अपने इस मन को कुत्ता कहूँ, या गीदड़ कहूँ, या बिल्ली कहूँ ! क्योंकि मेरे इस मन की प्रवृत्ति इन्हीं हिंसक पशुओं जैसी हो गयी है । 
या फिर इसे मानव की चाण्डाल जाति में उत्पन्न ढेढ(मृत पशु का चर्म उतारने वाला) या डोम(झाडू लगाने वाला) या भाँड(नाचने वाला) कहूँ ; क्योंकि इसका क्रियाकलाप भडैंत(नाचने) का ही हो गया । 
या फिर इसे चौर कहूँ या लुटेरा कहूँ, या ठग कहूँ, ऐसी जो भी उपमा दी जाय, इस के लिए कम ही है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसके लिये इनमें से जो भी उपमा दी जाय उचित ही लगेगी; क्योंकि इस मन की गति ऐसी ही दिखायी दे रही है ॥११॥ 
(क्रमशः)

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