🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
१४. रंग ताल ~
पार नहीं पाइये रे,
राम बिना को निर्वाहणहार ॥टेक॥
तुम बिन तारण को नहीं,
दूभर यहु संसार ।
पैरत थाके केशवा,
सूझै वार न पार ॥१॥
विषम भयानक भव - जला,
तुम्ह बिन भारी होइ ।
तूँ हरि तारण केशवा,
दूजा नांही कोइ ॥२॥
तुम्ह बिन खेवट को नहीं,
अतिर तिरा नहिं जाइ ।
औघट भेरा डूब है,
नांही आन उपाइ ॥३॥
यहु घट औघट विषम है,
डूबत मांहि शरीर ।
दादू कायर, राम बिन,
मन नहिं बाँधै धीर ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरु विनय करते हैं कि राम ! इस संसार - समुद्र का हम पार नहीं पा सकते । आपके बिना कौन है ? जो इससे हमें पार कर सके ।
.
हे राम ! आपके बिना कोई भी इस भयंकर संसार - समुद्र से पार करने वाला नहीं है । हे केशव ! योग आदि साधन करते हुए भी अब हम थक रहे हैं । इस संसार - समुद्र का उरला किनारा और परला किनारा नहीं दिखाई देता है । यह कठिन समय, भय देने वाला संसार - समुद्र है ।
.
आपके बिना इससे पार होना हमारे लिये भारी हो रहा है । हे केशव ! हे हरे ! आप ही इससे तारने वाले हो । आपके सिवाय दूसरा कोई भी हमें उबारने वाला नहीं है ।
.
इस मनुष्य देह रूपी नौका को खेने वाला आपके सिवाय दूसरा कोई नहीं हैं । हम तो अतिर हैं । हममें कोई भक्ति - वैराग्य आदि साधन नहीं है, इसीलिये इससे हम पार नहीं हो सकेंगे । यह हमारी मनुष्य देहरूपी नौका, भँवर में आ गयी है, डूबने वाली हो रही है । आपके सिवाय और दूसरा तारने वाला, हमें कोई साधन नहीं दिखाई दे रहा है ।
.
हे नाथ ! यह शरीर ही औघट घाट है, इसके अध्यास में हम डूबे जा रहे हैं । हे राम जी ! अब तो हमारा भी मन भी कायर व हताश हो रहा है, आपके बिना इसने धैर्य छोड़ दिया है । अब आप ही हमारी रक्षा कर सकते हैं ।
देही दूतिर मन अतिर, मौज मनोरथ मांहि ।
बिखम बारि - निधि राम बिन, रज्जब तिरिये नांहि ॥१४॥
बाहर कहिये कौन सौं, मांही मुसकिल काम ।
अन्तर अन्तर मेटिये, अन्तरजामी राम ॥१४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें