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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” ९/१०)*
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*श्री दादूजी शिष्यों को समझाना -*
देखि दशा निज शिष्यहिं श्री गुरु,
ज्ञान कथा कहि धीरज लाई ।
टीलहु जाय कही सब साधुन्ह,
गाथक रात भई जु सुनाई ।
आय परे चरणां मधि शिष्य जु,
बैन नहीं, दृग नीर भराई ।
दीन दयालु कहें हरि इच्छित,
दे उपदेश सबै समझाई ॥९॥
शिष्य टीलाजी की ऐसी दशा देखकर गुरुदेव ने ज्ञानोपदेश देकर धीरज बँधाया । पश्चात् टीलाजी ने यह सम्पूर्ण वार्ता अन्य साधु संतों को जाकर सुनाई । वार्ता सुनते ही सब शिष्य संत आकर गुरुदेव के चरणों में गिर पड़े, उनकी आँखों से नीर बहने लगा, मुख से वे कुछ नहीं बोल पा रहे थे । तब श्री दादूजी ने फरमाया - स्वरूप का सम्य विधान हरि इच्छा पर निर्धारित है । इसके लिये व्यथित नहीं होना चाहिये । साधु - संतों को ज्ञान - विचार करके हरि इच्छा को स्वीकारना चाहिये । इस तरह विविध प्रकार से उपदेश देकर उन्हें समझाया ॥९॥
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*संतों का संशय निवारणार्थ -*
गोविन्द और गुपाल किशोर जु,
केशव नरहरि जू मसकीना ।
दास गरीबहिं टीलु बतावत,
सिद्ध संवाद निशा सब चीन्हा ।
जो परसंग हि पूछन को मन,
सो सब बात अभी चित दीन्हा ।
फेर संदेह रहे मन भीतर,
कौन गुरु बिन भेद हु लीन्हा ॥१०॥
टीलाजी ने गोविन्ददास, गोपालदास, किशोरदास, केशव, नरहरि, मसकीनदास तथा गरीबदास को सिद्ध संवाद की निशा वार्ता बताते हुये कहा - गुरुदेव का स्वरूप अब अधिक समय तक नहीं रहेगा, अत: जो कुछ शंका समाधान करना है, ज्ञानोपदेश तथा भविष्य करके व्यवहार निर्वाह सम्बन्धी जो कुछ भी पूछना है अभी पूछ लीजिये । पश्चात् गुरुदेव के बिना भेद भ्रम कौन मिटायेगा ॥१०॥
(क्रमशः)

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