मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

११. मन को अंग ~ २३

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग* 
*एक ही बिटप विश्व ज्यौं कौं त्यौं ही देखियत,*
*अति ही सघन ताके पत्र फल फूल है ।* 
*आगिले झरत पात नये नये होत जात,* 
*ऐसौ याही तरु कौ अनादि काल मूल है ॥* 
*दश च्यारि लोक लौं प्रसरि जहां तहां रह्यौ,* 
*अध पुनि ऊरध सूखमि अरु थूल है ।* 
*कोऊ तौ कहत सत्य कोऊ तौ कहै असत्य,* 
*सुन्दर सकल मन ही कौ भ्रम भूल है ॥२३॥* 
*मन के भ्रम के मूल कारण* : इस 'संसार वृक्ष' को ज्यौं ज्यौं आप देखेंगे त्यों त्यों आप को इस के सभी पत्र पुष्प फल फूल सघन ही दिखायी देंगे ।
इसके पहले आये हुए पत्ते झरते रहते हैं, और नये नये उद्धत होते रहते हैं । इसी तरह, इस संसारवृक्ष की उतपत्ति का काल 'अनादि' कहा जा सकता है । 
यह संसार चौदह लोकों से व्याप्त है, ऊपर भी है, आकार में स्थूल भी है सूक्ष्म भी है । 
कोई इसे सत्य मानता है, कोई असत्य । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - हमारे मत में हमारे मन का यह उपर्युक्त भ्रम ही इस विश्ववृक्ष का मूल(आदि) कारण है ॥२३॥ 
[यह छन्द चित्रकाव्य में परिगणित है ।]
(क्रमशः)

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