#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*११. मन को अंग*
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*एक ही बिटप विश्व ज्यौं कौं त्यौं ही देखियत,*
*अति ही सघन ताके पत्र फल फूल है ।*
*आगिले झरत पात नये नये होत जात,*
*ऐसौ याही तरु कौ अनादि काल मूल है ॥*
*दश च्यारि लोक लौं प्रसरि जहां तहां रह्यौ,*
*अध पुनि ऊरध सूखमि अरु थूल है ।*
*कोऊ तौ कहत सत्य कोऊ तौ कहै असत्य,*
*सुन्दर सकल मन ही कौ भ्रम भूल है ॥२३॥*
*मन के भ्रम के मूल कारण* : इस 'संसार वृक्ष' को ज्यौं ज्यौं आप देखेंगे त्यों त्यों आप को इस के सभी पत्र पुष्प फल फूल सघन ही दिखायी देंगे ।
इसके पहले आये हुए पत्ते झरते रहते हैं, और नये नये उद्धत होते रहते हैं । इसी तरह, इस संसारवृक्ष की उतपत्ति का काल 'अनादि' कहा जा सकता है ।
यह संसार चौदह लोकों से व्याप्त है, ऊपर भी है, आकार में स्थूल भी है सूक्ष्म भी है ।
कोई इसे सत्य मानता है, कोई असत्य । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - हमारे मत में हमारे मन का यह उपर्युक्त भ्रम ही इस विश्ववृक्ष का मूल(आदि) कारण है ॥२३॥
[यह छन्द चित्रकाव्य में परिगणित है ।]
(क्रमशः)

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