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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२३८. रस । त्रिताल
मैं अमली मतवाला माता,
प्रेम मगन मेरा मन राता ॥टेक॥
अमी महारस भर भर पीवै,
मन मतवाला जोगी जीवै ॥१॥
रहै निरन्तर गगन मंझारी,
प्रेम पियाला सहज खुमारी ॥२॥
आसण अवधू अमृतधारा,
जुग जुग जीवै पीवणहारा ॥३॥
दादू अमली इहि रस माते,
राम रसायन पीवत छाके ॥४॥
क्षत्रियों का एक विशेष दिन अफीम बाँट कर खाने का होता है । उस दिन आमेर नरेश मानसिंह दादूजी के दर्शन करने आये तथा अति उत्तम शुद्ध किये हुये अमल की डिबिया खोलकर बोले - स्वामिन् ! आज तो आप भी थोड़ा - अमल लिजिये । तब दादूजी ने उक्त २३८ का पद बोला था ।
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फिर द्वितीय पद ६० कहा -
६०. पंचम ताल
रस के रसिया लीन भये,
सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥टेक॥
राम रसायन अमृत माते,
अविचल भये नरक नहीं जाते ॥१॥
राम रसायन भर भर पीवै,
सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥२॥
राम रसायन त्रिभुवन सार,
राम रसिक सब उतरे पार ॥३॥
दादू अमली बहुरि न आये,
सुख सागर ता मांहि समाये ॥४॥
यह पद भी सुनाकर अफीम अस्वीकार कर दिया था ।
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१७४. साधु महिमा । जय मंगल ताल
आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।
मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥टेक॥
मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।
सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥१॥
अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ ।
बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥२॥
क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।
आतम पाणी लौंण ज्यों, दूजा नांही आन ॥३॥
मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।
मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥४॥
टौंक नगर के वैष्णव संत माधवकाणी और नरहरिदास के गुरु का देहान्त हो गया था । उनके भंडारे पर उक्त दोनों संतों का संत सम्मेलन कराने का विचार हुआ । उक्त दोनों संतों की दादूजी पर अति श्रद्धा थी । इससे प्रथम वे दादूजी के पास आये और अपना उक्त विचार प्रकट किया और कहा - आपकी आज्ञानुसार ही हम करना चाहते हैं । दादूजी ने उनका समर्थन करके संत महिमा का उक्त ७३ का पद कहा था और संत सम्मेलन पर टौंक आने की स्वीकृति भी दी थी । फिर उक्त दोनों ने दादूजी की आज्ञानुसार तैयारी की थी ।
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