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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्विंशति तरंग” १५/१६)*
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*देवगण भी संत भेष में आये ~*
संत सब पूछें बात, भाई परसाद पात,
साधु रु गरीबदास बैठे मिलि पाँत है ॥
सेवक साधुन संग, भोजन करत रंज,
जय जयकार भणे जन, परसन्न शांत है ॥
बैरागी संन्यासी शेख, उदासी चकित देख,
महोत्सव ठाट पेख चाव न समात है ।
गन्धर्व किन्नर सुर, साधु सत वेषि धर ।
दर्श स्पर्श हर्ष सब व्योम पंथ जात है ॥१५॥
पश्चात् अपने पंथ के संत सेवकों के साथ गुरुभाई रज्जबजी आदि को साथ लेकर भोजन प्रसादी हेतु पंक्ति में बैठे । प्रीतिपूर्वक रुचि अनुसार भोजन करके सभी ने गुरुदेव की जय - जय घोष की । सभी जन अत्यन्त प्रसन्न थे । संत महोत्सव की शोभा व ठाट देखकर समागत वैरागी, संन्यासी शेख, उदासी आदि अन्य सम्प्रदायी साधु चकित रह गये । यथोचित सम्मान से वे सभी प्रसन्न हुये । इस संत महोत्सव में गन्धर्व किन्नर आदि देवगण भी साधु संतों के वेश में सम्मिलित हुये । संतों के दर्श स्पर्श करके हर्ष के साथ आनन्द लेते रहे, पश्चात् अपने लोक में पधार गये । यह रहस्य कुछ ज्ञानी संत ही जान पाये ॥१५॥
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*इन्दव छन्द*
*राजा नारायण सिंह देख कर चकित ~*
साधुन सेवक माँहि लियो यश,
संत प्रभावहिं देखत राऊ ।
संत उच्चार करें गुण गावत,
साधुन को उनको दृढ भाऊ ।
दीन दयालु रची रचना हरि,
नौतम मंगल होत उछाऊ ।
आपनु कारज आप सुधारत,
दास गरीब लियो यश लाऊ ॥१६॥
राजा नारायण सिंह ने साधु सेवा करके सुन्दर सुयश अर्जित किया । संत प्रभाव को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया । राजा ने संतों का गुणगान किया, संतों ने भी राजा की श्रद्धा सेवा की प्रशंसा की । तब राजा बोला - यह सब रचना दीनदयालु गुरुदेव श्री दादूजी की महिमा से हुई है, उन्हीं के तप: प्रभाव, नाम से, जन समुदाय एकत्र हुआ । गुरुकृपा से ही नवतम अनुपम यह मंगल कार्य सम्पन्न हो सका है । संतों के सब कार्य श्री हरि ही संपूर्ण करते हैं । यश और श्रेय सेवकों को दे देते हैं । वस्तुत: यश का लाभ तो श्री गरीबदास जी ने लिया है ॥१६॥
(क्रमशः)

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