रविवार, 16 नवंबर 2014

*नौलासा प्रसंग*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*नौलासा प्रसंग*
३५. परिचय सत्संग । दीपचन्दी ताल
सत्संगति मगन पाइये,
गुरु प्रसादैं राम गाइये ॥टेक॥
आकाश धरणी धरीजे, धरणी आकाश कीजे,
शून्य माहिं निरख लीजे ॥१॥
निरख मुक्ताहल मांहैं साइर आयो,
अपने पिया हौं ध्यावत खोजत पायौ ॥२॥
सोच साइर अगोचर लहिये,
देव देहुरे मांही कवन कहिये ॥३॥
हरि को हितार्थ ऐसो लखै न कोई,
दादू जे पीव पावै अमर होई ॥४॥
दादूजी खाटू से प्रस्थान करके करडाले आये और करडाले से तोसीना आये तोसीना से नौलासा और नौलासा में ईश्वरसिंह और उनकी पत्नी दोनों भक्त थे । एक दिन दोनों दादूजी के सामने कु़छ जिज्ञासा से बैठे थे तब दादूजी ने उक्त ३५ के पद से उनको उपदेश दिया था । उक्त उपदेश से उन दोनों की जिज्ञासा पूर्ण हो गई थी ।

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