सोमवार, 17 नवंबर 2014

= “च. विं. त.” १७/१८ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्विंशति तरंग” १७/१८)*
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वासर रैन भलीविध बाँटत, 
खारक लौंग पतास मिठाई । 
वासर बीत गये शशि ही निधि, 
संतसबै निज बात सुनाई । 
आवत है बरषा ॠतु वासर, 
देहु अज्ञा सब संत सिधाई । 
क्यों न थपो गुरु पाट सिंहासन, 
टीक करो किस देर कराई ॥१७॥ 
श्री दादूजी के निर्वाण(अन्तर ध्यान) दिवस ज्येष्ठ अष्टमी से अब तक निरन्तर संत महोत्सव में दूर - दूर समागत साधु संत, सेवक भक्तों को प्रसाद रूप में अहर्निश खारक, लौंग, पतासे और मिठाई बाँटी जा रही थी । इस तरह उन्नीस दिन व्यतीत हो गये थे । तब संतों ने आकर गरीबदास जी से निवेदन किया । हे गरीबदास जी ! वर्षा ॠतु आने वाली है, अत: सभी संतों को आदेश दीजिये, ताकि अपने स्थानों को विदा हो सके । और गुरु गद्दी पर भी उत्तराधिकारी की स्थापना करके तिलक कीजिये । इस कार्य में अब देरी क्यों कर रहे है? ॥१७॥ 
*रज्जब जी ने गरीबदास जी से कहा गुरुगद्दी पर बैठो* 
रज्जब दास - गरीब सुनावत, 
क्यूं न लहो गुरु आसन भाई । 
साधुन माँहिं लियो यश पूरण, 
कीरति तोरि चहूं दिश छाई । 
यों सुनि के दृग नीर चल्यो अति, 
भीजत अम्बर प्रीति बढाई । 
रज्जब भ्रात कहें किम सोचत, 
ये जग रीत प्रथा चलि आई ॥१८॥ 
सभी संतों की सहमति से रज्जबजी ने गरीबदास जी से कहा - हे गुरुभाई ! अब आप गुरु आसन पर क्यों नहीं बिराज रहे हो ? संत महोत्सव की संपूर्ण से आपका यश चारों दिशाओं में छा गया है, सभी साधु आपको गुरु गद्दी पर विराजमान देखना चाहते है । ऐसे वचन सुनकर गरीबदास जी की आँखों में नीर बह चला । गुरुदेव के स्मरण से हृदय गद्गद् हो गया । अश्रुओं की बाढ़ से शरीर के अम्बर भी भीग गये । संतों की प्रीति देखकर वे सोच में डूब गये । तब रज्जबजी बोले - हे गुरुभाई ! इस विषय में इतना सोच विचार क्यों कर रहे हो ? यह तो जग रीति चली आई है कि - गुरु के आसन पर कोई शिष्य तो उत्तराधिकार का निर्वाह करेगा ही । सभी संत आपको ही गुरु आसन पर विराजमान देखना चाहते हैं । अब इस प्रथा को तो निभाना ही है ॥१८॥
(क्रमशः)

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