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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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५१. संजीवनी । पंचम ताल ~
राम विमुख जग मर मर जाइ,
जीवैं संत रहैं ल्यौ लाइ ॥टेक॥
लीन भये जे आतम रामा,
सदा सजीवन कीये नामा ॥१॥
अमृत राम रसायन पीया,
तातैं अमर कबीरा कीया ॥२॥
राम राम कह राम समाना,
जन रैदास मिले भगवाना ॥३॥
आदि अंत केते कलि जागे,
अमर भये अविनासी लागे ॥४॥
राम रसायन दादू माते,
अविचल भये राम रंग राते ॥५॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव संजीवनी रूप राम - रस का परिचय करा रहे हैं कि राम - सजीवन स्वरूप से विमुख रहकर संसार के प्राणी मर - मर कर चौरासी में जाते हैं और राम के भक्त संत, राम - नाम स्मरण में लय लगाकर सजीवन रूप होते हैं ।
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जो जीवरूप आत्मा, राम - रसायन में लीन हुए हैं, वे नामदेव भक्त की भाँति, सदा सजीवन रूप हो गये हैं ।
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इस राम - रसायन रूप अमृत को कबीर जी पीकर अमर हो गये और
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राम - नाम का स्मरण करते - करते, भक्त रैदास जी भगवान् में अभेद हुये ।
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इस कलि - काल में आदि से अन्त पर्यन्त, कितने ही सत्संग द्वारा जागकर, राम - नाम का स्मरण करते हुए अविनाशी राम को प्राप्त करके अमर हो गये हैं ।
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जो राम रसायन को पीकर राते = रत्त और माते = मतवाले रहते हैं, वे राम के रंग में रत्त होकर अविचल स्वरूप हो गये हैं ।
कवित ~
एक अनेक, अनेक फिर एक है,
एकहि एक न और कोई ।
सत को एक, अनेक संसार को,
रह्या भरपूर सम्भाल सोई ।
संत तो अमर हैं, मरै हैं असंतजन,
नरक और स्वर्ग इहि भांति होई ।
नरक और स्वर्ग सब होत हैं अनेक को,
दास पलटू देख - देख रोई ॥५१॥
(क्रमशः)

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