🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“चतुर्विंशति तरंग” २३)*
.
*त्रोटक छन्द*
गुरु संत महोत्सव कीन्ह भले,
जग में शुभ कीरति प्रेम फले ।
सब संत मिले गुरु टीक किये,
जब दास गरीब जु पाट लिये ।
गुण वार न पार अपार मता,
सुखदायक लायक जोग यथा ।
दुविधा दुख साधुन दूर करी,
ॠधियाँ सिधियाँ जुसमीप खरी ॥
.
नग हाटक बीचक हीर कणी,
चमकात यथा शिरमोर मणी ।
दम दामिनि मेघ उज्जास करे,
घन गाजत प्रेम हिं धार भरे ॥
गुरु दादु दयालु हिं पाट दिपे,
भवसागर नाम जहाज थपे ।
कलि काल सुसाधुहिं रूप धरे,
हरि आप विभूति सुसंत भरे ॥
.
अनुभै मुख आप उचार करे,
जग जीवहिं दु:ख रु ताप हरे ।
शुचि ज्ञान गंभीर अगाध मती,
दृढ शील सुमेरु अडिग्ग जती ।
तनशीतल रूप मयंक बसै,
तप तापस तेज उद्योत लसै ।
सुध साधु जु तीरथ रूप मही,
जन सेवक आय तिरें सब ही ॥
.
गुरु गोरखज्यों शुक श्याम सती,
सनकादिक सादर संत जती ।
जप जापहिं जो शिव शक्र विधी,
निज नाम जपें जु सुसंत सुधी ॥
गुरु आसन दास - गरीब दिपे,
सब साधु सूपूज्य जिन्हें थरपे ॥
यह संस्तुति संत उचार धणे,
जन माधव यों गुण गाय भणे ॥२३॥
हे गरीबदास जी ! आपने गुरुदेव का निर्वाण(अन्तरध्यान) महोत्सव अतीव श्रद्धा और प्रीति से संपूर्ण किया है । इससे आपकी शुभ कीर्ति जगत् में फैल गई है । सभी संत आपसे प्रेम करते हैं, अत: गुरुगद्दी पर विराजमान करके आपके तिलक किया गया है । आपके सद्गुणों का बार - पार नहीं है, आप सभी के लिये सुखदायक और गुरु आसन के योग्य है । आपने यह उत्तरदायित्व स्वीकार करके सभी की दुविधा और दु:ख मिटा दिये । ॠद्धियाँ और सिद्धियाँ आप जैसे संत के सम्मुख सेवा में रहती है ।
आप साधुओं के बीच उसी प्रकार सुशोभित हैं, जैसे सुवर्ण हार के बीच हीरे की कणी होती है । आप शिरोमणि के समान साधुता से देदीप्यमान है । जैसे दामिनी मेघों के बीच चमक कर उजाला करती है, वैसे ही आप साधुओं तथा सेवकों के बीच भक्ति ज्ञान का उजाला करेंगे । मेघ वर्षा के समान अपने मुखारविन्द से गरजते हुये भक्ति प्रीति की धारा बरसायेंगे । श्री दादू दयाल जी के पाट पर विराजमान हे संत ! आप भवसागर के पार उतरने के लिये नामरूपी जहाज की स्थापना करे । इस कलियुग में साधु ही श्री हरि का रूप होते हैं, इस सनातन वचन के अनुसार श्री हरि की विभूतियाँ आप में विद्यमान हैं, अत: आप अपने मुख से अनुभव सिद्ध ज्ञान का उपदेश देते हुये जगत् जीवों का दु:ख और संताप हरे ।
आप शुचि ज्ञान वाले अगाध मति विद्वान हैं, स्वभाव से गंभीर, सुमेरू के समान दृढ़शील वाले, अडिग जती है । आपका स्वरूप मयंक के समान शीतल है । आप में तपस्या का तेज उल्लसित एवं भासित है । आप जैसा शुद्ध साधु पृथ्वी पर तीर्थ समान है । जो भी श्रद्धालु जन आपके पास आवेंगे, वे तिर जावेंगे ।
आप गुरुदेव श्री दादूजी, गोरखनाथ जी, शुकदेवजी, श्याम सनकादिक के समान जती यती रूप में रहते हुये अखण्ड नाम जाप में लगे रहो, शिव शक्रादि की विधि के अनुसार नाम स्मरण करके महान् संत बनो । गुरु आसन की शोभा बढ़ाओ । सभी आपकी पूजा व सम्मान करते है । इस तरह साधु संतों ने गरीबदास जी की संस्तुतियाँ की । जिनका वर्णन माधवदास गुणगान करते हुये इस ग्रन्थ में प्रस्तुत कर रहा है ॥२३॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें