गुरुवार, 20 नवंबर 2014

*= किरड़ौली प्रसंग =*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= किरड़ौली प्रसंग =* 
३. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल
मेरे मन भैया राम कहो रे ।
राम नाम मोहि सहज सुनावै, उनहीं चरण मन कीन रहो रे ॥टेक॥
राम नाम ले संत सुहावै, कोई कहै सब शीश सहो रे ।
वाही सौं मन जोरे राखो, नीके राशि लिये निबहो रे ॥१॥
कहत सुनत तेरो कछू न जावै, पापनि छेदन सोई लहो रे ।
दादू रे जन हरि गुण गावो, कालहि जालहि फेरि दहो रे ॥२॥
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किरड़ोली में ही एक दिन सत्संग के समय एक चुतरदास नाम के व्यक्ति आये थे और सत्संग से प्रभावित होकर दादूजी से पू़छा - स्वामिन् ! मेरे को कौनसा साधन करना चाहिये । सो मेरे योग्य ही मुझे अवश्य बताइये । तब दादूजी ने उक्त ३ के पद से उनको करने योग्य साधन बताया था । किरड़ोली में ही जगराम जाट भी कु़छ उपदेश की इच्छा से दादूजी के सामने बैठा था । 
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अतः उसकी भावना को जानकर उसे - २६ का पद - 
२६(ख) पंजाबी त्रिताल
जियरा काहे रे मूढ डोले ?
वनवासी लाला पुकारे, तूँही तूँही कर बोले ॥टेक॥
साथ सवारी ले न गयो रे, चालण लागो बोले ।
तब जाइ जियरा जाणैगो रे, बाँधे ही कोई खोले ॥१॥
तिल तिल मांहैं चेत चली रे, पंथ हमारा तोले ।
गहिला दादू कछू न जाणै, राख ले मेरे मोले ॥२॥
सुनाकर उपदेश दिया था ।
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फिर किरडोली में ही भरता जाट भी दादूजी से कु़छ सुनने की इच्छा से सत्संग के बाद भी बैठा ही रहा तब दादूजी उसके मन का भाव जानकर पद २५ - सुनाकर उपदेश किया था ।
२५. हितोपदेश । चटताल
जियरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तज विकार ॥टेक॥
तूँ जनि भूले मन गँवार, शिर भार न लीजे मान हार ॥१॥
सुन समझायो बार - बार, अजहूँ न चेतै, हो हुसियार ॥२॥
कर तैसे भव तिरिये पार, दादू अब तैं यही विचार ॥३॥

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