शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

= ४८ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
४८. राज विधाधर ताल ~
पूर रह्या परमेश्‍वर मेरा, 
अणमांग्या देवै बहुतेरा ॥टेक॥
सिरजनहार सहज में देइ, 
तो काहे धाइ माँग जन लेइ ॥१॥
विश्‍वंभर सब जग को पूरै, 
उदर काज नर काहे झूरै ॥२॥
पूरक पूरा है गोपाल, 
सबकी चिंत करै दरहाल ॥३॥
समर्थ सोई है जगन्नाथ, 
दादू देख रहे संग साथ ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव अपने को उपलक्षण करके कहते हैं कि वे हमारे परमेश्‍वर, हमारे मन के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण कर रहे हैं अर्थात् बिना याचना के ही बहुत कुछ दे रहे हैं ।
.
जब सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाले परमेश्‍वर, स्वभाव से ही दे रहे हैं, तो फिर क्यों किसी के पास दौड़कर मांगने का प्रयत्न करें ?
.
वह सम्पूर्ण विश्‍व को रचकर सबका भरण - पोषण करने वाले सारे जगत् को पूर रहे हैं । तो हे नर ! तूँ क्यों अपने उदर पूर्ति के लिये छटपटाता है ?
.
वह गोपाल सबका पालन करने वाले सब प्रकार देने में पूर्ण हैं । चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त को तत्काल पूरते हैं ।
.
ऐसे वह समर्थ जगत् के ‘नाथ’ कहिए स्वामी हैं । वह सब ही के साथ निवास कर रहे हैं । उन्हीं को अन्तर्वृत्ति से साक्षात्कार करो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें