शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

🌷🙏*🇮🇳 #daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*साचे झूठ न पूजै कबहूँ, सत्य न लागै काई ।*
*दादू साचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥*
==================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*भ्रम विध्वंस का अंग १३५*
.
खांडे संग फेरे लिये, खुशी खसम१ सँग होय ।
त्यों प्राणि पाणि२ प्रतिमा लगी, हेति३ और सब कोय ॥२५॥
जैसे नारी खाँडे के साथ फेरा लेती है किंतु प्रसन्न तो स्वामी१ के मिलने पर ही होती है वैसे ही प्राणियों के हाथ२ मूर्ति लगी है किंतु प्रेमी३ तो सभी का मूर्ति से अन्य प्रभु ही है ।
.
व्हाहे खाँडे तीर संग, त्यों प्रतिमा व्यवहार ।
सब समझैं संदेह बिन, आगे है भरतार१ ॥२६॥
जैसे खांडे और बाण के संग विवाह का व्यवहार होता है तब सब संशय रहित समझते हैं कि - स्वामी१ तो खांडे तथा बाण से अलग है । वैसे ही मूर्ति पूजा का व्यवहार है, मूर्ति से आगे ही प्रभु हैं, मूर्ति तो उनके प्राप्ति का साधन बनती है ।
.
गोहों१ परि गुम्मट२ रच्या, सदा रहै सो नांहिं ।
त्यों मूरती पर मन महल, सुरति अमूरती मांहि ॥२७॥
कंडो१ पर जो मिट्टी का गुम्बद२ बनाया जाता है, वह सदा नहीं रहता, उसके उपर चूने का बनता है वही रहता है । वैसे मूर्ति पर जो मन संकल्पादि महल बनाता है, वह भी सदा नहीं रहता, कुछ काल में वृत्ति मूर्ति रहित प्रभु में ही जाने लगती है ।
.
कालबूत१ करि काढणा२, पहले ही यहु भाव ।
रज्जब तब लग राखिये, जब लग होय लदाव ॥२८॥
मकान बनाने का साँचा१ जिस पर लदाव करते हैं, उसके निकालने२ का भाव पहले से ही रहता है । वह तब तक रक्खा जाता है जब तक लदाव होकर सूख जाय । वैसे ही मूर्ति तब तक ही साधन रूप से मानी जाती है जब तक भगवान के वास्तविक रूप का ज्ञान न हो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें