#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
साहिब सौं सन्मुख रहै, सत संगति में आइ ।दादू साधू सब कहैं, सो निष्फल क्यों जाइ ॥
ब्रह्म गाय त्रि लोक में, साधु अस्तन पान ।
मुख मारग अमृत झरै, कत ढूँढै दादू आन ॥
दादू पाया प्रेम रस, साधु संगति मांहि ।
फिरि फिरि देखे लोक सब, यहु रस कतहूँ नांहि ॥
दादू जिस रस को मुनिवर मरैं, सुर नर करैं कलाप ।
सो रस सहजैं पाइये, साधु संगति आप ॥
संगति बिन सीझे नहीं, कोटि करे जे कोइ ।
दादू सतगुरु साधु बिन, कबहुँ शुद्ध न होइ ॥

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें