गुरुवार, 20 नवंबर 2014

= १९४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू तलफि तलफि विरहनी मरै, करि करि बहुत बिलाप ।
विरह अग्नि में जल गई, पीव न पूछै बात ॥ 
दादू कहॉं जाऊँ ? कौण पै पुकारूँ ? पीव न पूछै बात ।
पीव बिन चैन न आवई, क्यों भरूँ दिन रात ? ॥ 
दादू विरह बियोग न सहि सकूँ, मोपै सह्या न जाइ ।
कोई कहो मेरे पीव को, दरस दिखावै आइ ॥
दादू विरह बियोग न सहि सकूँ, निसदिन सालै मोहि ।
कोई कहो मेरे पीव को, कब मुख देखूँ तोहि ॥ 
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साभार : Suresh Aggarwal ~
ॐ श्री गुरवे नमः, शुभ प्रभात दोस्तों, जय श्री कृष्णा !!
मेरी प्रार्थना : हे प्रभु पुरे जीवन भटक भटक कर, इतना भटकने के बाद बस इतना ही समझ पाया हूँ कि तुम मेरे भीतर ही विद्यमान हो, सभी संतो के कथन एक जैसे हैं, कि परमात्मा तुम्हारे भीतर है, वह जिस प्रकार तिलों मे तेल, दूध मे घृत(घी), चकमक पथर में आग, आदि विद्यमान है | 
उसी प्रकार तुम मेरी नस नस, हड्डियों, रोम रोम, में विदयमान हो. अभी तुम्हें जाना नहीं है, पर जानना चाहता हूँ, बाहर तो बहुत बहुत भटक चुका हूँ, अब सिर्फ तुमे जानने के लिए भीतर ही भटकूंगा, सिर्फ एक ही प्रार्थना है, कि हे नाथ, हे मेरे नाथ, एक क्षण के लिए भी आपको भूलू नहीं जी | 
यदि कोई अपने भीतर, डूबने कि कला सीख लेता है तो उससे धनवान व्यक्ति कोई नहीं है जी |

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