॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१४. बचन बिवेक को अंग*
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*राजा कौ कुंवर जौ सुरूप कै कुरूप होइ,*
*ताकौ तसलीम करि गोद लै खिलाइये ॥*
*और काहू रैति कै सुरूप होइ सोभनीक,*
*ताहू कौं तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥*
*काहू कै कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन,*
*वाकी ओर देखि देखि माथौ ई हलाइये ॥*
*सुन्दर कहत वाके, बाप ही कौ प्यारौ लागै,*
*यौं ही जानि बांनि कौ बिवेक ऐसैं पाइये ॥३॥*
*(क)*कोई राजपुत्र, फिर भले ही वह रूपवान् हो या कुरूप, सभी को प्रिय लगता है । उस को सभी लोग प्रणाम(तसलीम) कर, गोद में ले स्नेह से खिलाते हैं ।
*(ख)*कोई प्रजाजन(रैयत) का पुत्र, यदि वह सुरूप हो तो उसे, प्रेमपूर्वक अपने पास बुला लिया जाता है ।
*(ग)*तथा किसी साधारण आदमी का कुरूप एवं अंगहीन पुत्र हो तो उसे देखकर अपने स्थान पर ही बैठे बैठे सिर हिला दिया जाता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वह तो उसके पिता को ही प्रिय लगता है । यही उपमा(तुलना) ऊपर छन्द में वर्णित त्रिविध वाणियों में भी जाननी चाहिए ॥३॥
(क्रमशः)

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