गुरुवार, 20 नवंबर 2014

१४. बचन बिवेक को अंग ~ ३

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१४. बचन बिवेक को अंग*
*राजा कौ कुंवर जौ सुरूप कै कुरूप होइ,* 
*ताकौ तसलीम करि गोद लै खिलाइये ॥* 
*और काहू रैति कै सुरूप होइ सोभनीक,* 
*ताहू कौं तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥* 
*काहू कै कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन,* 
*वाकी ओर देखि देखि माथौ ई हलाइये ॥* 
*सुन्दर कहत वाके, बाप ही कौ प्यारौ लागै,* 
*यौं ही जानि बांनि कौ बिवेक ऐसैं पाइये ॥३॥* 
*(क)*कोई राजपुत्र, फिर भले ही वह रूपवान् हो या कुरूप, सभी को प्रिय लगता है । उस को सभी लोग प्रणाम(तसलीम) कर, गोद में ले स्नेह से खिलाते हैं । 
*(ख)*कोई प्रजाजन(रैयत) का पुत्र, यदि वह सुरूप हो तो उसे, प्रेमपूर्वक अपने पास बुला लिया जाता है । 
*(ग)*तथा किसी साधारण आदमी का कुरूप एवं अंगहीन पुत्र हो तो उसे देखकर अपने स्थान पर ही बैठे बैठे सिर हिला दिया जाता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वह तो उसके पिता को ही प्रिय लगता है । यही उपमा(तुलना) ऊपर छन्द में वर्णित त्रिविध वाणियों में भी जाननी चाहिए ॥३॥ 
(क्रमशः)

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