॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग*
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*संसार के सुखनि सौं आसक्त अनेक विधि,*
*इन्द्री हूँ लोलुप मन कबहूं न गह्यौ है ।*
*कहत है ऐसै मैं तो एक ब्रह्म जानत हूं,*
*ताहि तैं छोडि कै शुभ कर्मन कौं रह्यौ है ॥*
*ब्रह्म की न प्राप्ति पुनि कर्म सब छूटि गये,*
*दुहुंन तैं भ्रष्ट होइ अधबिच बह्यौ है ॥*
*सुन्दर कहत ताहि त्यागिये श्वपच जैसे,*
*याही भांति ग्रन्थ में बसिष्ठजी हू कह्यौ है ॥४॥*
जो सांसारिक सुखों में नाना प्रकार से आसक्त है, जो इन्द्रियलोलुप है, जिसका मन चंचल है ।
वह मुख से कहता है कि मैं केवल एक ब्रह्म को जानता हूँ, अतः वह शुभ कर्मों का भी त्याग कर बैठता है ।
इस तरह उसने शुभ कर्म भी छोड़ दिए और उधर उस को ब्रह्म भी नहीं मिला - दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम ।
ऐसे कृत्रिम(ढोंगी) ज्ञानी को उसी तरह दूर रखना चाहिये जैसे चाण्डाल को समाज से दूर(बहिष्कृत) रखा जाता जय ।
श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - ऐसे बात गुरु वशिष्ठ ने अपने योगवाशिष्ठ ग्रन्थ में कहि है ॥४॥
(क्रमशः)
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग*
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*संसार के सुखनि सौं आसक्त अनेक विधि,*
*इन्द्री हूँ लोलुप मन कबहूं न गह्यौ है ।*
*कहत है ऐसै मैं तो एक ब्रह्म जानत हूं,*
*ताहि तैं छोडि कै शुभ कर्मन कौं रह्यौ है ॥*
*ब्रह्म की न प्राप्ति पुनि कर्म सब छूटि गये,*
*दुहुंन तैं भ्रष्ट होइ अधबिच बह्यौ है ॥*
*सुन्दर कहत ताहि त्यागिये श्वपच जैसे,*
*याही भांति ग्रन्थ में बसिष्ठजी हू कह्यौ है ॥४॥*
जो सांसारिक सुखों में नाना प्रकार से आसक्त है, जो इन्द्रियलोलुप है, जिसका मन चंचल है ।
वह मुख से कहता है कि मैं केवल एक ब्रह्म को जानता हूँ, अतः वह शुभ कर्मों का भी त्याग कर बैठता है ।
इस तरह उसने शुभ कर्म भी छोड़ दिए और उधर उस को ब्रह्म भी नहीं मिला - दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम ।
ऐसे कृत्रिम(ढोंगी) ज्ञानी को उसी तरह दूर रखना चाहिये जैसे चाण्डाल को समाज से दूर(बहिष्कृत) रखा जाता जय ।
श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - ऐसे बात गुरु वशिष्ठ ने अपने योगवाशिष्ठ ग्रन्थ में कहि है ॥४॥
(क्रमशः)

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