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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*खाटू प्रसंग से आगे*
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गोगुलिये गुसांइयों की सम्मति से दादूजी की मारने के लिये मतवाला हाथी छोड़ा गया । दादूजी शिष्यों के सहित मार्ग से जा रहे थे तब हाथी को आता देखकर रज्जब और गरीबदास रोकने को आगे बढ़ने लगे तब दादूजी ने उनको रोकते हुये कहा - किसको रोकने जाते हो ? हमारा रक्षक तो उस हाथी में भी बैठा हैं, रुक जाओ ।
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दोनों रुक गये तब दादूजी ने अपने शिष्यों को यह ३८९ का पद ~
३८९. नाम शूरातन । मकरन्द ताल
निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥टेक॥
सेवक शूर शंक नहीं मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥१॥
नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥२॥
सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥३॥
हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥४॥
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फिर हाथी आया और दादूजी के चरण छूकर शांत भाव से लौट गया । हाथी के लौट जाने से राजा आदि गोकुलिये गुसांइयों को अति आश्चर्य हुआ फिर वे सहानुभूति के लिये सब आकर मिले । फिर दुर्गा भक्त दादूजी आदि सब संतों को अपने घर ले गया । भोजन कराया । फिर दादूजी के पास बैठा तब दादूजी ने उसे ....
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२७६. उपदेश चेतावनी । मकरंद ताल
कुछ चेति रे कहि क्या आया ।
इन में बैठा फूल कर, तैं देखी माया ॥टेक॥
तूँ जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देख भुलाया ।
आज काल चल जावै देही, ऐसी सुन्दर काया ॥१॥
राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया ।
दादू हरि की सेवा कीजे, सुन्दर साज मिलाया ॥२॥
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फिर जहां ठहरे थे वहाँ पधार गये । फिर वहाँ राजा रायसिंह आया और अपने पूर्व कर्म के लिये क्षमायाचना करने लगा । तब दादूजी ने कहा - हमने तो क्षमा पहले ही कर रखी है तुम्हारे किये कर्म का फल तो तुम ही भोगोंगे उसको तो हम कैसे हटा सकते है फिर साखी कही -
घट घट दादू कह समझावे, जैसा करे सो तैसा पावे ।
को काहू का सीरी नांहीं, साहिब देखे सब घट मांहीं ॥
(साँच अंग१३)
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उक्त साखी सुनाकर - ४२ का पद -
४२. काल चेतावनी राग गौड़ी । पंजाबी त्रिताल
काहे रे नर करहु डफाण, अंत काल घर गोर मसाण ॥टेक॥
पहले बलवंत गये विलाइ, ब्रह्मा आदि महेश्वर जाइ ॥१॥
आगैं होते मोटे मीर, गये छाडि पैगम्बर पीर ॥२॥
काची देह कहा गर्वाना, जे उपज्या सो सबै विलाना ॥३॥
दादू अमर उपावनहार, आपहि आप रहै करतार ॥४॥
यह पद भी सुनाया ।
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फिर राजा ने माला तिलकादि प्रसंग चलाया तब दादूजी ने कहा -
दादू माला तिलक से कु़छ नहीं काहू सेती काम ।
अंतर मेरे एक है, अह निशि उसका नाम ॥
(भेष अंग १४)
इतने में ही हिमालय की रसायनी गुफा में बड़े सुन्दरदासजी को रायसिंह के षड्यंत्र का ज्ञान अपनी योगशक्ति से हो गया । अतः तत्काल वे खाटू ग्राम में रायसिंह दादूजी के पास बैठा माला तिलकादि के रखने का आग्रह कर रहा था, उसी स्थान में प्रकट होकर राजा रायसिंह को डांटते हुये कहा - तुम क्या कर रहे हो ? संतों की सेवा करना चाहिये या उनके शरीर को नष्ट करने का षड्यंत्र रचना चाहिये ।
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राजा रायसिंह अपने पूर्व आश्रम के चाचाजी के उक्त वचन सुनकर अति लज्जित होकर बोला - मुझसे गलती हो ही गई है किन्तु अब सेवा ही करुंगा । फिर रायसिंह ने दादूजी को बीकानेर पधारने की प्रार्थना की किन्तु दादूजी ने स्वीकार नहीं की । बड़े सुन्दरदासजी राजा को समझाकर तत्काल ही गुरुजी को प्रणाम करके तथा गुरुजी से आज्ञा मांगकर वहां अन्तर्धान हो गये ।

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