#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१४. बचन बिवेक को अंग*
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*एक बांणी रूपवंत भूषन बसन अंग,*
*अधिक बिराजमान कहियत ऐसी है ।*
*या बांणी फाटे टूटे अम्बर उढ़ाये आंनि,*
*ताहू मांहि बिपरीत सुनियत तैसी है ॥*
*एक बांणी मृतक ही बहुत सिंगार किये,*
*लोकिनि कौ नीकी लगै संतनि कौं भै सी है ।*
*सुन्दर कहत बांणी त्रिबिध जगत मांहि,*
*जानै कोऊ चतुर प्रबीन जाकै जैसी है ॥२॥*
*त्रिविधवाणी* : एक वाणी(वचन) ऐसी होती है जैसे कोई रूपवती, सुवर्णाभूषणों से भूषित तथा महार्घ वस्त्रों से आच्छन्न हो ।
तथा एक वाणी ऐसी होती है कोई मानों फाटे पुराने मलिन वस्त्रों से आच्छन्न हो ।
तथा एक वाणी ऐसी होती है, जैसे किसी मृतक को विविध श्रृंगार कर बैठा दिया गया हो ।
ये तीनों ही वाणियाँ साधारण जनों के लिये कितनी ही मनोमुग्धकारी क्यों न हों, सन्तजनों के लिये तो वह भयदायिनी है(कि इसे सुनकर पुनः जगत्प्रपंच में न फँस जायँ) ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस तरह जगत् में ये तीन प्रकार की वाणी मानी गयी हैं । कोई चतुर प्रवीण मनुष्य ही इन तीनों को, पृथक् पृथक् भेद कर के, जान सकता है ॥२॥
(क्रमशः)

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