बुधवार, 19 नवंबर 2014

१४. बचन बिवेक को अंग ~ २

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१४. बचन बिवेक को अंग*
*एक बांणी रूपवंत भूषन बसन अंग,* 
*अधिक बिराजमान कहियत ऐसी है ।* 
*या बांणी फाटे टूटे अम्बर उढ़ाये आंनि,* 
*ताहू मांहि बिपरीत सुनियत तैसी है ॥* 
*एक बांणी मृतक ही बहुत सिंगार किये,* 
*लोकिनि कौ नीकी लगै संतनि कौं भै सी है ।* 
*सुन्दर कहत बांणी त्रिबिध जगत मांहि,* 
*जानै कोऊ चतुर प्रबीन जाकै जैसी है ॥२॥* 
*त्रिविधवाणी* : एक वाणी(वचन) ऐसी होती है जैसे कोई रूपवती, सुवर्णाभूषणों से भूषित तथा महार्घ वस्त्रों से आच्छन्न हो । 
तथा एक वाणी ऐसी होती है कोई मानों फाटे पुराने मलिन वस्त्रों से आच्छन्न हो । 
तथा एक वाणी ऐसी होती है, जैसे किसी मृतक को विविध श्रृंगार कर बैठा दिया गया हो । 
ये तीनों ही वाणियाँ साधारण जनों के लिये कितनी ही मनोमुग्धकारी क्यों न हों, सन्तजनों के लिये तो वह भयदायिनी है(कि इसे सुनकर पुनः जगत्प्रपंच में न फँस जायँ) । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस तरह जगत् में ये तीन प्रकार की वाणी मानी गयी हैं । कोई चतुर प्रवीण मनुष्य ही इन तीनों को, पृथक् पृथक् भेद कर के, जान सकता है ॥२॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें