बुधवार, 19 नवंबर 2014

*= किरड़ौली प्रसंग =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*= किरड़ौली प्रसंग =*
१५५. काल चेतावनी । तुरंग लील ताल
जाग रे, किस नींदड़ी सूता,
रैण बिहाई सब गई, दिन आइ पहूँता ॥टेक॥
सो क्यों सोवे नींदड़ी, जिस मरणा होवे रे ।
जोरा वैरी जागणा, जीव तूँ क्यों सोवे रे ॥१॥
जाके सिर पर जम खड़ा, शर सांधे मारे रे ।
सो क्यों सोवे नींदड़ी, कहि क्यूँ न पुकारे रे ॥२॥
दिन प्रति निशि काल झंपै, जीव न जागे रे ।
दादू सूता नींदड़ी, उस अंग न लागे रे ॥३॥
प्रयागदासजी दादूजी को जब अपने ग्राम किरडोली ले गये थे तब एक दिन संत सेवा में अधिक थकान आने से दादूजी से पहले नहीं उठ सके थे । तब उनको जगाने के लिये उक्त १५५ का पद बोला था ।
.
और फिर - १५६ पद भी -
१५६. तुरंग । लील ताल
जाग रे सब रैण बिहांणी, जाइ जन्म अंजलि को पाणी ॥टेक॥
घड़ी घड़ी घड़ियाल बजावै, जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै ॥१॥
सूरज चंद कहैं समझाइ, दिन दिन आयु घटती जाइ ॥२॥
सरवर पाणी तरवर छाया, निशिदिन काल गिरासै काया ॥३॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, दादू आतम राम न जाना ॥४॥
बोला था । दोनों पद उच्च स्वर से बोलने से प्रयागदासजी आदि सब ही जाग गये और सब के मनों पर दोनों पदों का अच्छा प्रभाव पड़ा था ।
.
१३६. हितोपदेश । त्रिताल
जागत को कदे न मूसै कोई ।
जागत जान जतन कर राखै, चोर न लागू होई ॥टेक॥
सोवत साह वस्तु नहिं पावे, चोर मूसै घर घेरा ।
आस पास पहरे को नाहीं, वस्ते कीन नबेरा ॥१॥
पीछे कहु क्या जागे होई, वस्तु हाथ तैं जाई ।
बीती रैन बहुरि नहिं आवै, तब क्या करि है भाई ॥२॥
पहले ही पहरे जे जागै, वस्तु कछू नहिं छीजे ।
दादू जुगति जान कर ऐसी, करना है सो कीजे ॥३॥
दादूजी किरड़ोली में थे तब ही संतदास अग्रवाल चमरिया भी दादूजी के सत्संग में थे । दादूजी के उपदेशों से प्रभावित होकर उन्होंने अपने कुटुम्ब के सहित दादूजी से दीक्षा ले ली थी । उन्हीं को उक्त १३६ के पद से उपदेश दिया था । ये संतदासजी के नाम से दादूजी के १०० शिष्यों में प्रसिद्ध हैं ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें