मंगलवार, 25 नवंबर 2014

= ३ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
आतम देव आराधिये, विरोधिये नहिं कोइ । 
आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 
ज्यों आपै देखै आपको, यों जे दूसर होइ । 
तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 
दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान । 
दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 
दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ । 
परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 
सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत । 
ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 
---------------------------------------- 
सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र ~ 
¤»»»»»»»»»»»»»»»»»»»✿»»»»»»»»»»»»»»»»»»»¤ 
"धन्य !!! धन्य !!!" जो भगवान का भजन करते हैं !!! {१} 
¤»»»»»»»»»»»»»»»»»»»✿»»»»»»»»»»»»»»»»»»»¤ 
नारायण ! हम यहाँ जिस भजन शब्द का प्रयोग करके, उस पर सत्संग करने जा रहे हैं वह सामान्य दृष्टि का भजन नहीं है ! हमने किसी विशेष दृष्टि को लेकर भजन शब्द का प्रयोग किया है ! परमात्मा परमशिव का भजन अनेक प्रकार का होता है । भगवान् ने गीता में कई प्रकार के भजनानन्दी भक्तो का वर्णन किया लेकिन अन्त में कहा कि आत्मज्ञान के बाद का भजन किस प्रकार का होता है । भगवान् ने श्रीगीता जी के अठाहवे अध्याय में सारे ही साधनों को संक्षेप में कहा : 
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । 
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ 
अहंकार बलं दर्पँ क्रोधं परिग्रहम् । 
विमुच्च निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ 
{भगवद्गीता} 
भक्त ब्रह्म के साथ एक कैसे होता है इसकी सारी साधना संक्षेप में इन श्लोकों में बता दिया । ब्रह्मभूत कैसा होता है ? "विविक्तसेवी" एकान्त देश में रहने वाला; "लघ्वाशी" बहुत कम पदार्थोँ का सेवन करने वाला; "यतवाक्कायमानसः" शरीर, वाणी और मन के ऊपर नियन्त्रण रखने वाला; "ध्यानयोगपरो नित्यं" नित्य ही ध्यान - योग में लगा रहने वाला; "वैराग्यं समुपाश्रितः" वैराग्य का सहारा लेकर अहंकार, बल, दर्प अर्थात् घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह इन सबको छोड़कर; "विमुच्य निर्ममः शान्तः" किसी भी पदार्थ से रहित होकर; "ब्रह्मभूयाय कल्पते" तब ब्रह्म के साथ एकता का अनुभव करता है । ये सब तो ब्रह्मभवन के पहले साधन हुए । अब उसके आगे भगवान् कहते हैं 
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । 
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ।" 
जब वह ब्रह्मीभवन हो गया अर्थात् अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध, परिग्रह सब छोड़ चुका. इन्हें छोड़ने के बाद वह जब परब्रह्म परमात्मा के साथ अखण्ड अद्वैत का अनुभव कर रहा है, उसके बाद वह क्या करता है ? भगवान् ने कहा "मद्भक्तिं लभते परां" तब परम भजन को प्राप्त करता है । यहाँ जो हमने कहा कि धन्य लोग भजन करते हैं, तो यह आत्मज्ञानी का भजन है, पराभक्ति है । 
नारायण ! भगवान् श्री मधुसूदन श्रीकृष्ण उसका सामान्य रूप पहले बता दिया "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा"; जब परब्रह्म परमात्मा से उसका एक्य है तो वह हमेशा ही प्रसन्नात्मा होता है, अर्थात् उसके देह, मन, बुद्धि सब नित्य प्रसन्न रहते हैं । सामान्य नियम है कि आग के पास बैठने वाला व्यक्ति अवश्य गरम हो जाता है, क्योंकि आग स्वरूप से गरम है । इसी प्रकार से जिस देह, मन, बुद्धि के साथ ब्रह्मभूत का थोड़ा भी सम्बन्ध हो गया, वहाँ प्रसन्नता अपने आप नृत्य करती है । 
वह प्रसन्न होता है, ऐसा नहीं समझना - मेरे बाबा । स्वभाव से ही वह प्रसन्न है । वह यदि कभी दुःखी बनने का ढोंग रचना भी चाहे तो जैसे अपना बच्चा कोई विचित्र - सा काम करता है तो माँ डाँटती है पर डाँटते - डाँटते उसे हँसी आ जाती है । 
एक अपना लड़का था, उसे पता था कि प्लग किसी छेद में लगाया जाता है । उसे छेद कहीं नहीं मिला, उसने उस प्लग को अपनी नाक में घुसा लिया ! अब उसे माँ डाँट भी रही है कि "बिजली की चीज़ को हाथ मत लगा, नहीं तो मारूँगी", यह कहते - ही - कहते उसे हँसी छूट गई । उससे कहा "क्या फायदा हुआ यों डाँटने से ?" कहती है, "हँसी आ जाती है क्या करूँ !" 
इसी प्रकार से किसी भी व्यक्ति को कोई ऊटपटांग काम करते देखकर भगवती डाँटती भी है तो अन्दर से उन्हें हँसी छूटती है । कारण क्या है । जब तक अन्तःकरण में बल, दर्प, काम क्रोध होता है तब तक यह लगता है कि यह गलत और ठीक है । अपने बच्चे के कार्य में गलती की भावना नहीं होती इसलिये उससे अन्तःकरण में एक प्रसन्नता होती है । इसी प्रकार से सर्वत्र सब परिस्थितियों में उसके अन्दर - ही - अन्दर प्रसन्नता का फव्वारा फूटता ही रहता है । 
जब तक आत्मज्ञान में दृढ़ नहीं हो गया, तब तक तो जीव को यह नहीं पता कि सुख नाम की क्या चीज है । बेचारा एक दुःख से दूसरे दुःख में ही घूमता रहता है । यथाकथंचित् कभी किसी काल में दुःख कम हो गया तो उसे ही सुख मान लेता है । आत्म - ज्ञान की दृढ़ता के बाद उसे पता ही नहीं चलता कि दुःख नाम चीज क्या है । यथाकथंचित् लोगों के कहने से वह दुःख नाम की चीज़ चाहता भी है तो उसे कुछ समझ में नहीं आता। बिलकुल उल्टा हो गया । "न शोचति न कांक्षति" इसीलिये उसे न कभी किसी चीज का शोक होता है और न किसी चीज को प्राप्त करने की इच्छा ही होती है । 
भगवान् श्रीभाष्यकार आचार्य शङ्करभगवत्पाद् इसी के भाष्यम् में लिखते हैं "न हि अप्राप्तविषयाकांक्षा ब्रह्मविदः उपपद्यते" जो विषय प्राप्त नहीं, उसकी आकांक्षा ब्रह्मवेत्ता में नहीं होती, युक्ति से भी सिद्ध नहीं होती । इसके दो कारण हैं एक तो कोई ऐसी चीज़ नहीं जो उसे पहले से प्राप्त न हो और जो प्राप्त नहीं वह पदार्थ है, ऐसा वह मान ही नहीं सकता । अर्थात् प्राप्त न होकर विषय कहीं पर रखा है, यह नहीं बनता, क्योंकि उसका मतलब हुआ कि कोई अज्ञात और अप्राप्त विषय है; लेकिन बिना ज्ञान से सम्बन्ध किये विषय ठहरेगा किस पर ? 
इसलिये भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं कि अप्राप्त विषय की अकांक्षा उसे कभी होती ही नहीं । कांक्षा का मतलब ही होता है अप्राप्त विषय की इच्छा । जो चीज पहले पास नहीं है, उसी की तो इच्छा कांक्षा, आकांक्षा है । तत्त्वज्ञ की इच्छा हमेशा प्राप्त को विषय करती है। प्राप्त विषय की आकांक्षा रहती है, तो जो चीज अपने पास है उसकी इच्छा मनुष्य को कभी शोक नहीं दे सकती । 
नारायण ! शोक हमेशा अप्राप्त का होता है । इसलिये भगवान् ने कहा "न शोचति न कांक्षति ।" ये दोनों एक - दूसरे में हेतुहेतुमद्भाव से संबद्ध है । आकांक्षा न होने से ही शोक नहीं है । यह उसका स्वरूप बताया कि स्व विषय में वह प्रसन्न रहता है, उसको कभी भी शोक और आकांक्षा नहीं होती । 
नारायण ! और "समः सर्वेषु भूतेषु" जब वह दूसरे को देखता है तो सम दृष्टि से देखता है । सारे ही प्राणियों को , चर - अचर अर्थात् जड - चेतन जगत् को वह सम अर्थात् एक जैसा ही देखता है । सबको एक जैसा ही देखता है इसका मायने क्या ? क्या सबको काला - ही - काला, या गोरे रंग का या नाटा - ही - नाटा अथवा लम्बा - ही - लम्बा देखता है ? भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं कि "सम" का मतलब है "आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च ।" हर चीज को वह अपनी उपमा से समझ लेता है कि यह दुःख और सुख एक समान है । 
यदि उसे ठण्डी हवा अच्छी लगती है तो दूसरे को भी ठण्डी अच्छी लगती है, बड़ी सीधी - सी बात है । संसारी लोगों के व्यवहार " आत्मौपम्येन " नहीं होते, अपने कुछ कुछ और अच्छा लगता है, पर मानते हैं कि दूसरे को कुछ और अच्छा लगना चाहिये । अपने को आठ बजे उठना अच्छा लगता है, नौकरों को पाँच बजे उठना चाहिये । हमको रोज घूमने जाना अच्छा लगता है, नौकर को हफ्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं लेनी चाहिये । 
हम अपने अपने बच्चों के विवाह में पाँच हजार रुपये के बिजली की सजावट करेंगे, लेकिन मुनीम जी अपने बच्चे के विवाह में खर्च के लिये कुल पाँच हजार रुपये माँगे तो उन्हें नहीं माँगना चाहिये । यह संसारी अनात्मज्ञों का व्यवहार है । इसलिये तो भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं, सुख और दुःख प्रत्येक प्राणी के हृदय में अपनी आत्मा की उपमा से समझ लेनी चाहिये । यह बड़ी सीधी बात होने पर भी हमारा राग - द्वेष से आक्रान्त अन्तःकरण उसके अन्दर अनेक प्रकार के पर्दों का निर्माण करता है । 
हैं कि "सम" का मतलब है "आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च ।" हर चीज को वह अपनी उपमा से समझ लेता है कि यह दुःख और सुख एक समान है । यदि उसे ठण्डी हवा अच्छी लगती है तो दूसरे को भी ठण्डी अच्छी लगती है, बड़ी सीधी - सी बात है । संसारी लोगों के व्यवहार "आत्मौपम्येन" नहीं होते, अपने कुछ कुछ और अच्छा लगता है, पर मानते हैं कि दूसरे को कुछ और अच्छा लगना चाहिये । 
अपने को आठ बजे उठना अच्छा लगता है, नौकरों को पाँच बजे उठना चाहिये । हमको रोज घूमने जाना अच्छा लगता है, नौकर को हफ्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं लेनी चाहिये । हम अपने अपने बच्चों के विवाह में पाँच हजार रुपये के बिजली की सजावट करेंगे, लेकिन मुनीम जी अपने बच्चे के विवाह में खर्च के लिये कुल पाँच हजार रुपये माँगे तो उन्हें नहीं माँगना चाहिये । यह संसारी अनात्मज्ञों का व्यवहार है । 
इसलिये तो भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं, सुख और दुःख प्रत्येक प्राणी के हृदय में अपनी आत्मा की उपमा से समझ लेनी चाहिये । यह बड़ी सीधी बात होने पर भी हमारा राग - द्वेष से आक्रान्त अन्तःकरण उसके अन्दर अनेक प्रकार के पर्दों का निर्माण करता है । पर्दोँ का निर्माण करके अनात्म - दृष्टि के ऊपर आग्रह वाला बनता है । जहाँ - जहाँ भेद है वहाँ - वहाँ उपाधि की प्रधानता है और जहाँ अभेद है वहाँ उपाधि वाले की अर्थात् उपहित की प्रधानता है । 
ज्ञानी को उपाधि नहीं दीखती ऐसा नहीं है, लेकिन वह उपाधि के द्वारा उपहित को पकड़ता है । जैसे घड़ा है, अज्ञानी को भी दीखा, ज्ञानी को भी दीखा । अज्ञानी को घटरूपी उपाधि प्रधान दीखी, "है" रूपी परमात्मा गौण दीखा । ज्ञानी को "है" - रूप उपहित प्रधान दीखा, घट ने केवल व्यक्त कर दिया । इसलिये ज्ञानी व्यवहार के अन्दर उपहित को प्रधान लेता है और अज्ञानी उपाधि को प्रधान लेता है । उपहित सर्वत्र एक है, उपाधि अलग - अलग है । इसीलिये भगवान् भाष्यकार आचार्य सर्वज्ञ शङ्कर ने सीधी - सी पहचान बता दी "आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च" । 
सावेशेष ..... 
नारायण स्मृतिः 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें