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॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१४. बचन बिवेक को अंग*
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*और तो बचन ऐसै बोलत हैं पसु जैसैं,*
*तिनकै तौ बोलिबे मैं ढंग हूँ न एक है ।*
*कोऊ राति दिवस बकत ही रहत ऐसैं,*
*जैसी बिधि कूप मैं बकत मानो भेक हैं ॥*
*बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब,*
*घट घट मुख मुख बचन अनेक हैं ।*
*सुन्दर कहत तातैं बचन बिचारि लेहु,*
*बचन तौ उहै जामैं पाइये बिवेक है१॥८॥*
(१. तुकबन्दी में समानता दर्शनार्थ छन्द में बहुवचन क्रिया का प्रयोग है ।)
*विवेकपूर्ण वचन का महत्व* : कुछ पुरुषों का बोलना ऐसा होता है, जैसे कोई पशु बोल रहा हो । उनके बोलने की पद्धति में कोई सभ्य आचार विचार नहीं है ।
कोई रात दिन इस प्रकार बोलते तहते हैं जैसे कूवे में मेंढक बोला करते हैं ।
इस तरह जगत् में लोगों के प्रकार अनेक हैं; क्योंकि प्रत्येक प्राणी के शरीर का मुख पृथक् पृथक् है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वचन बोलने से पूर्व उसके औचित्य अनौचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिये, क्योंकि वही वचन उत्तम कहा जाता है जो विवेकमिश्रित हो ॥८॥
(क्रमशः)

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