मंगलवार, 25 नवंबर 2014

१४. बचन बिवेक को अंग ~ ८

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१४. बचन बिवेक को अंग*
*और तो बचन ऐसै बोलत हैं पसु जैसैं,*
*तिनकै तौ बोलिबे मैं ढंग हूँ न एक है ।* 
*कोऊ राति दिवस बकत ही रहत ऐसैं,* 
*जैसी बिधि कूप मैं बकत मानो भेक हैं ॥* 
*बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब,* 
*घट घट मुख मुख बचन अनेक हैं ।* 
*सुन्दर कहत तातैं बचन बिचारि लेहु,* 
*बचन तौ उहै जामैं पाइये बिवेक है१॥८॥* 
(१. तुकबन्दी में समानता दर्शनार्थ छन्द में बहुवचन क्रिया का प्रयोग है ।) 
*विवेकपूर्ण वचन का महत्व* : कुछ पुरुषों का बोलना ऐसा होता है, जैसे कोई पशु बोल रहा हो । उनके बोलने की पद्धति में कोई सभ्य आचार विचार नहीं है । 
कोई रात दिन इस प्रकार बोलते तहते हैं जैसे कूवे में मेंढक बोला करते हैं ।
इस तरह जगत् में लोगों के प्रकार अनेक हैं; क्योंकि प्रत्येक प्राणी के शरीर का मुख पृथक् पृथक् है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वचन बोलने से पूर्व उसके औचित्य अनौचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिये, क्योंकि वही वचन उत्तम कहा जाता है जो विवेकमिश्रित हो ॥८॥ 
(क्रमशः)

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