#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि ।
डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥
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बिष्णु देव चंद्रवंशी ~
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भगवच्चिंतन और आहार - शुद्धि....
जब तक चीज अनुभव में नहीं आती तब तक ठीक - ठीक विश्वास नहीं पड़ता संसार का ही चिन्तन हमेशा होता रहता है। इसलिये परमात्मा का चिन्तन करने में कठिनाई पड़ती है।
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भगवान ने कहा है ...
"मार्च्चक्ता मदगत् प्राणः बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्य तुष्यन्ति च रमन्ति च।"
अर्थात्, मुझसे ही अपने चित्त को लगाओ। संसार का चिन्तन न हो, परमात्मा का ही चिन्तन होता रहे। तात्पर्य यह है कि भगवान ने कोई भी समय, कोई भी अवस्था ऐसी नहीं छोड़ी है कि उनके चिन्तन से खाली जाय। अनेक चित्तता होने का प्रधान कारण यही है कि आहार की शुद्धि नहीं है।
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आहार - शुद्धि के विषय में धनार्जन का प्रकार यह है कि ---
"अकृत्वा परसन्तापं, अगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लंध्य सताँ वर्त्मं यदल्पमपि तद् बहु॥"
अर्थात्, किसी को कष्ट न देकर दुष्टों से सम्पर्क न रखते हुए अपनी आत्मा को अधिक उलझन में न डालकर थोड़ा भी मिल जाय तो बहुत है। दुसरे को कष्ट देकर जो धन पैदा किया जायगा वह धन तो पड़ा रह जायगा, परन्तु दूसरे को दिये हुए कष्ट का पाप अपने सूक्ष्म शरीर के साथ जायगा। इसलिये ऐसा न करो कि पाप की गठरी साथ में जाय।
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'अगत्वा खलमन्दिरम्' का तात्पर्य यह है कि यदि नीच लोगों के निकट जाओगे तो बुद्धि भ्रष्ट होगी और बुद्धि भ्रष्ट हुई तो पतन निश्चित है।
'अनुल्लंध्य सताँ वर्त्म' का तात्पर्य यह है कि सत्पुरुषों के द्वारा जो वेद - शास्त्रानुसार जिस मार्ग का अनुशरण किया गया है, उसका उल्लंधन नहीं करना चाहिये।
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यदि व्यवहार में किसी समय खलों का सम्पर्क करना ही पड़े तो इस प्रकार उनके पास जाना चाहिये, जैसे पाखाने में जाते हो --- काम किया और चलते हुये। पाखाने में कोई अधिक देर तक नहीं ठहरता। यदि ऐसी बुद्धि रक्खोगे तो नीचों के संपर्क से अधिक हानि की शंका नहीं रहेगी। शुद्ध मन परमात्मा के निकट जाता है और अधुद्ध मन नाना प्रकार की भावनाओं में भटकता रहता है। इसलिये आहारशुद्धि के द्वारा मन को विशेष रूप से शुद्ध बनाने का प्रयत्न करते रहना चाहिये --- धान्य - शुद्धि पर बहुत अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता है। खान - पान ठीक रक्खोगे, भगवान का चिन्तन करते रहोगे तो अवश्य ही मन शुद्ध हो जायगा।
शुद्ध मन से लोक में भी सुख - शान्ति का अनुभव करोगे और परलोक में भी उत्तम गति को प्राप्त करोगे।
चोरी, दगाबाजी, भृष्टाचार आदि करते हुये अपने को विष्णु - भक्त वैष्णव मानने से कोई वैष्णव नहीं हो सकता।
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शिव, गणेश, सूर्य, शक्ति आदि सब भगवान के अङ्ग हैं। कोई शिव - भक्त कहे कि हमारे शङ्कर ही भगवान हैं, कोई सौर्य कहे कि सूर्य ही भगवान हैं तो यह उसी प्रकार है जैसे सम्पूर्ण हाथी के स्वरूप को न जाननेवाले कुछ अंधों ने हाथी की सूँड पकड़कर कहा कि यह हाथी मूसल के समान है। किसी ने चरण पकड़कर कहा कि हाथी खम्भे के समान है। किसी ने कान पकड़कर कहा कि हाथी ऐसा ही सूप के समान है। बात यही है इसी प्रकार जिसने भगवान को ठीक से समझ लिया है वह कभी नहीं कह सकता कि शिव ही भगवान का स्वरूप है या गणेश ही भगवान का स्वरूप है या विष्णु का चतुर्भुजि रूप ही भगवान का स्वरूप है। जो यथार्थ भगवत् - तत्व से परिचित है वह यही कहेगा कि इन समस्त भिन्न - भिन्न स्वरूपों में वही एक परमात्मा के भिन्न - भिन्न अङ्ग रूप हैं। वास्तव में किसी भी देवता की उपासना भगवान की ही उपासना है। यही शास्त्र का सिद्धान्त है।

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