शनिवार, 27 दिसंबर 2014

१७. बिरहनी उलाहने को अंग ~ ४

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
.
*१७. बिरहनी उलाहने को अंग* 
.
*हीये और जीये और लीये और दीये और,* 
*कीये और कौन ऊ अनूप पाटी पढ़े हैं ।* 
*मुख और बैंन और नैंन और सैंन और,* 
*तन और मन और जंत्र मांहि कढ़े हैं ॥* 
*हाथ और पाँव और सीसहू श्रवण और,* 
*नख सिख रोम रोम कलई सौ मढ़े हैं ।* 
*ऐसी तौ कठोरता सुनि न देखि जगत मैं,* 
*सुन्दर कहत काहू ब्रज ही के गढ़े हैं ॥४॥* 
उनके हृदय में कुछ अन्य बात है, जिह्वा पर कुछ अन्य बात; वे लेते कुछ अन्य हैं, देते कुछ अन्य; करते कुछ हैं तो कहते कुछ हैं । यह ज्ञात नहीं होता कि उन्होंने धोखा देने की यह कौन सी पाठी पढ़ रही है । 
इनके मुख में कुछ दूसरी बात है और वाणी से कुछ अन्य ही सुनायी देता है, नयनों का संकेत कुछ कहता है तो भृकुटि का संकेत अन्य ही बात प्रकट करता है । इनके तन और मन ऐसे लगते हैं जैसे ये दोनों ही किसी यंत्र से संचालित हों । 
मानों इनके हाथ, पैर, शिर, कान, नख, शिखा यहाँ तक कि रोम रोम पर धोखे की कलई चढ़ी हुई है । 
जगत् में ऐसी कठोरता हमने अन्यत्र न कहीं देखी है, न सुनी है । *श्री सुन्दरदास जी* महाराज कहते हैं - लगता है इनका निर्माण किसी वज्र से ही हुआ है ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें