बुधवार, 31 दिसंबर 2014

*~ राहोरी प्रसंग ~*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*~ राहोरी प्रसंग ~*
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फिर थोलाई से राहोरी के भक्त दादूजी को राहोरी ले आये । सत्संग चलने लाग । एक दिन राहोरी में रामदत्त ने पू़छा - स्वामिन् ! संपूर्ण बातों की सार रूप बात क्या है ? जिसको धारण करके प्राणी कृतार्थ हो सके । दादूजी ने कहा -
दादू सब बातन की एक है, दुनिया तै दिलदूर ।
सांई सेती संग कर, सहज सूरति लै पूर ॥२४॥
(लै अंग ७)
रामदत्त दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ शिष्यों में हैं ।
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फिर रामदत्त के भाई चतुरभुज ने पू़छा - स्वामिन् ! प्रभु के सन्मुख और सदा संग में कैसे रहा जाता है ? तब दादूजी ने कहा -
दादु सहजैं सुरति समायले, पार ब्रह्म के अंग ।
अरस - परस मिल एक हो, सन्मुख रहबा संग ॥२६॥
(लै अंग ७)
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फिर खेमदास ने पू़छा - भगवन् ! लययोग किस को कहते हैं । दादुजी ने कहा -
सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन ।
सहज रूप सुमिरण करे, निष्कामी दादु दीन ॥२७॥
(लै अंग ७)
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फिर हापाजी दादुजी के दर्शन करने राहोरी में आये थे उन्होंने पू़छा - स्वामिन् ! ब्रह्म के स्वरूप में प्रवेश कैसे होता है ? दादुजी ने कहा -
दादु सेवा सुरति से, प्रेम प्रीति से लाय ।
जहँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाय ॥२९॥
(लै अंग ७)

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