बुधवार, 31 दिसंबर 2014

१८. शब्दसार को अंग ~ ३

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१८. शब्दसार को अंग* 
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*सुर उहै मन कौं बसि राखत,* 
*कूर उहै रन मांहि लहै है ।* 
*त्याग उहै अनुराग नहीं कहुं,* 
*भाग उहै मन मोह तजै है ॥* 
*तज्ञ उहै निज त्वनि जानत,* 
*यज्ञ उहै जगदीश यजै है ।* 
*रत्त उहै हरि सौं रत सुन्दर,* 
*भक्त उहै भगवंत भजे हैं ॥३॥* 
'शूर'(वीर) वही कहलाता है जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकें । 'क्रूर' उसे कहना चाहिये जो युद्ध में दृढ़ता के साथ डटा रहे । 
'त्याग' उसे कहते हैं, जहाँ(त्याज्य द्रव्य में) किसी प्रकार की आसक्ति न रहे । 'भाग' उसे कहना चाहिये जब हमारा मन सर्वविध जगत्प्रपंच के मोह से मुक्त हो जाये । 
'तज्झ'(तत्वज्ञ-ज्ञानी) उसे कहते हैं, जो आत्मतत्व का भली भाँति साक्षात्कार कर चुका हो(या जो अज्ञ न हो) तथा 'यज्ञ' उसे कहना चाहिये, जिससे जगत्कर्त्ता प्रभु परमात्मादेव की पूजा हो ।' 
रक्त्त'(प्रेमी) वही है जिसका प्रभु परमात्मा में सच्चा अनुराग हो । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसी प्रकार 'भक्त' उसे कहना चाहिये जो निरन्तर भगवान् का भजन(सेवा) करता हो ॥३॥ 
(क्रमशः)

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