रविवार, 28 दिसंबर 2014

= ६४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ । 
जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे मार्या जाइ ॥ 
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बिष्णु देव चंद्रवंशी ~ 
----||●||●|| भगवतत्व ||●||●||---- 

विघ्नों के भय से मार्ग नहीं छोड़ना चाहिये गिरने का कोई भय नहीं, भगवान् रक्षा करेंगे भगवान को जान लेने के बाद, फिर कोई वस्तु जानने योग्य नहीं रह जाती। एक बार भगवत्तत्व का रसास्वादन हो गया कि फिर वृत्ति अन्यत्र कहीं विषयों में फँस नहीं सकती। कोई राजा कैसे दो गाँव की जमींदारी की इच्छा कर सकता है। 
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जो आनन्द समुद्र में अवगाहन कर रहा है वह क्षणिका - नन्द - विषयानन्द - के लिये कैसे इच्छा करेगा ? लोग कहते हैं - भगवान् ने कहा है कि मेरी त्रिगुणात्मिका माया दुरत्यय है अर्थात पार करने के लिये कठिन है। परन्तु जो मेरी शरण आते है वे मेरी इस दुरत्यय माया को भी पार कर जाते है - 
"दैवी ह्येषाँ गुणमयी मम माया दुरत्यया। 
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥" 
अतः विध्नों के भय से मार्ग नहीम् छोड़ना चाहिये। भगवान सब प्रकार से रक्षा करते हुए अपने समीप बुला लेते हैं। गिरने - गिराने का डर नहीं है, मार्ग पर चलते जाओ। प्रवृत्ति को अशुभ से रोक कर शुभ में लगाना - यही मुख्य पुरुषार्थ है अशुभ कर्मों में प्रवृत्ति न हो और शुभ कर्मों में ही प्रवृत्ति रहे -- यही मुख्य पुरुषर्थ है। अशुभ वासनायें उठें तो मन को जप, कीर्तन या स्वाध्याय तोत्र या भगवच्चरित पाठ आदि में लगा देना चाहिये। यहीं उपनिषद का सिद्धन्त है - 
पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभो पथि॥ 
अशुभ वासनायें मन में उठे तो उन्हें रोकना और किसी तरह उसमें प्रवृत्त न होना और शुभवासना उठें तो यथाशीघ्र प्रवृत्त होने का प्रयत्न करना, यही पुरुषार्थ है

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