शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

= ६१ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता । 
दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥ 
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Gauri Mahadev ~ विक्रम और बेताल
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बेताल ने राजा से कहा, "हे राजन, रास्ते में मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। अगर तू बोला तो मैं वापस पेड़ पर चला जाऊँगा। तो सुन.... एक भारत देश में एक सज्जन पुरुष रहता था जो चहुँ ओर व्याप्त भ्रष्टाचार से बहुत दुखी था। उसने आन्दोलन किये, जन सभाओं में आवाज़ उठाई कि दोषिओं को सजा मिलनी चाहिए, उसने ढेर सारे कागज प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये। उसकी मांग थी कि दोषियों को तुरंत जेल भेजा जाए लेकिन सत्ता में बैठे लोग कहाँ ऐसा करने वाले थे ??? वो अपने ही विरुद्ध क्यों कर ऐसा करते भला ? 
फिर समय बीता... भाग्य ने करवट बदली। वह सज्जन पुरुष राजा बन गया। परन्तु राजा बनकर भी उसने किसी के विरुद्ध मुकदमा चलाने की शुरुआत नहीं की। ऐसा क्यों ? 
हे राजन, इस सवाल का उत्तर अगर तूने जानते हुए भी नहीं दिया तो तेरे सर के दो टुकड़े हो जायेंगे।" 
राजा बोला, "बेताल, सत्ता में आने के बाद मनुष्य बदल जाता है। वह किसी भी काम को करने से पहले उसके दूरगामी परिणामों के बारे में सोचता है। आन्दोलन करते समय उसके पास खोने को कुछ नहीं होता। राजा बनने के बाद उसे राज्य का विस्तार करने की चिंता होती है। वह उचित अवसर की ताक में रहने लगता है। उसे लगता है जब जनता वर्षों से झेल रही है तो और भी झेल लेगी। थोड़ा चूरन-चटनी चटा दो इसको। हे बेताल ! यह मानव स्वभाव है। इसमें राजा का इतना दोष नहीं !" 
बेताल बोला, "राजा तू कितना समझदार है... पर तू बोला, और मैं चला।" 
कहकर बेताल वापस पेड़ पर लटक गया।

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