शनिवार, 27 दिसंबर 2014

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८७. वैराग्य उपदेश । निसारुक ताल ~
मेरा मेरा छाड़ गँवारा, 
सिर पर तेरे सिरजनहारा ।
अपने जीव विचारत नांहीं, 
क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥टेक॥
तव मेरा कृत करता नांही, 
आवत है हंकारा ।
काल चक्र सौं खरी परी रे, 
विसर गया घरबारा ॥१॥
जाइ तहाँ का संजम कीजै, 
विकट पंथ गिरिधारा ।
दादू रे तन अपना नांहीं, 
तो कैसे भया संसारा ॥२॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरु इसमें वैराग्य का उपदेश कर रहे हैं कि हे गँवार ! विषयों के प्रेमी ! मैं हूँ, यह सब कुछ मेरा है, इसको अन्तःकरण से छोड़ दे । यह सब धन, धाम, कुटम्ब परिवार आदि तो तेरे मस्तक पर सृष्टि - कर्ता ईश्‍वर है, उसी के ये सब किये हुए हैं । तूँ इनका अहंकार क्यों करता है ?
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अपने जीव में सत्य असत्य का विचार क्यों नहीं करता है ? तेरे पूर्वज, क्या यहाँ से कुछ साथ ले गये हैं, जो तूँ अब अहम्ता करता है ? जब यमदूत अन्त समय में आवेंगे, तब तेरा किया हुआ कर्म, तेरी कोई भी रक्षा नहीं करेगा । और वे यमलोक के हलकारे, तेरे गले में यम फाँसी डाल लेंगे और निश्‍चय ही करके कालरूपी चक्र तेरे ऊपर पड़ेगा । उस वक्त तूँ सम्पूर्ण घरबार और परिजनों को भूल जायेगा ।
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क्योंकि इस विपत्ति की बेला में इनमें से कोई तेरा साथ नहीं देगा । अतः यदि तुझे अपने प्रियतम परमेश्‍वर के पास जाना है, तो वहाँ जाने के लिये संयम रूपी मार्ग को धारण कर । आगे बड़े भारी विकट रास्ते से तुझे जाना है । और ममता रूप हिमालय की चोटी को लांघना है । यह शरीर ही तेरा नहीं है, तो तैंने संसार को अपना कैसे मान रखा है यह तेरा कैसे होगा ?
(क्रमशः)

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