सोमवार, 29 दिसंबर 2014

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८९. भक्ति उपदेश । त्रिताल ~
पूजूं पहली गणपति राइ, 
पड़िहौं पावों चरणों धाइ ।
आगै ह्वै कर तीर लगावै, 
सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥टेक॥
कहूँ कथा कुछ कही न जाई, 
इक तिल में ले सबै समाइ ॥१॥
गुण हु गहीर धीर तन देही, 
ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ २ ॥
जिस दिशि देखूं ओही है रे, 
आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥३॥
दादू रे आगै क्या होवै, 
प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव भक्ति का उपदेश करते हैं कि हम तो उसी परमेश्‍वर की उपासना करते हैं, जो सर्व से प्रथम, कहिए सम्पूर्ण सृष्टि के उपादान कारण और निमित कारण हैं, वही सम्पूर्ण देवों के, मुनि - गण के, नर - गण आदि सभी के, उपास्य देव हैं और सम्पूर्ण विश्‍व के वह राजा हैं । हम संसार की ओर से हटकर उन्हीं प्रभु के चरणों की शरण ले रहे हैं ।
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वही साधन मार्ग में हमें आगे साथ लेकर पार करने वाले हैं । और स्वभाव से ही अपने भक्तजनों को, वे ज्ञान भक्ति के उपदेश, अपनी प्राप्ति कराने वाले सुनाते रहते हैं ।
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मैं उनके गुणों का कुछ वर्णन करूँ, परन्तु मेरे लिये उनके गुण अकथनीय हैं, क्योंकि वह ऐसे समर्थ हैं, एक तिल रूप माया में, सम्पूर्ण सृष्टि को लय करते हैं । उनके गुण बहुत गहरे हैं और उनके शरीर में अपार धैर्य है,
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और फिर ऐसे समर्थ हैं कि सबको अपनी शक्ति से उत्पन्न करके कर्मानुसार पालन करते हैं और महाप्रलय काल में, सबको अपने आप में समा लेते हैं ।
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जिस - जिस दिशा में हम देखते हैं, उधर वह ही वह व्यापक रूप से दिखाई दे रहे हैं । जैसे पहाड़ वृक्षों से, लताओं से आच्छादित रहता है, उसी प्रकार वह सम्पूर्ण विश्‍व को आच्छादित कर रखा है ।
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मुक्तजन कहते हैं कि आगे न मालूम क्या होवेगा ? हे जीवों ! अभी से उस परमेश्‍वर में अपनी प्रीति द्वारा अपने मन को लगा लो ।
(क्रमशः)

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