गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८५. शंखताल(फारसी) ~
संइयां तूँ है साहिब मेरा,
मैं हूँ बन्दा तेरा ॥टेक॥
बन्दा वरदा चेरा तेरा,
हुकमी मैं बेचारा ।
मीरां मेहरबान गुसांई,
तूँ सिरताज हमारा ॥१॥
गुलाम तुम्हारा मुल्ला जादा,
लौंडा घर का जाया ।
राजिक रिजक जीव तैं दिया,
हुकम तुम्हारे आया ॥२॥
शादील बै हाजिर बंदा,
हुकम तुम्हारे मांही ।
जब ही बुलाया तब ही आया,
मैं मेवासी नांही ॥३॥
खसम हमारा सिरजनहारा,
साहिब समर्थ सांई ।
मीरां मेरा मेहर मया कर,
दादू तुम ही तांई ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे परमेश्‍वर ! आप ही हमारे विरहीजनों के स्वामी हो और हम विरहीजन आपके सेवक हैं ।
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हम तो आपके वरदाये हुए दास हैं । मैं तो बिचारा आपके हुक्म में रहने वाला हूँ । आप हमारे दयालु स्वामी हो हम विरहीजनों के सिर के ताज हो ।
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हम तो आपके मोल लिये हुये गुलाम दास हैं । और फिर आपके ही घर के पैदा हुए लौंडे हैं । आप हमारे जीव को रिजक देने वाले राजिक हो । मैं तो आपके हुकम से आया हूँ ।
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जब आप मुझे ‘सादील’ कहिए बुलाओगे, तभी मैं आपका बन्दा, आपके हाजिर हो जाऊँगा । मैं तो आपके हुक्म में रहने वाला हूँ । जब ही बुलाओेगे, तब ही तत्काल आऊँगा । मैं यहाँ का रहने वाला नहीं हूँ ।
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हे सिरजनहार ! आप ही हमारे खाविंद हो । हे समर्थ साहिब ! अब आप हमको अपना जानकर दया - मया करो । हम तो आपके लिये ही पुकार करते हैं ।
(क्रमशः)

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