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🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*कल्याण पट्टण प्रसंग से आगे*
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कल्याण पट्टण में मांगा नामक व्यक्ति ने पू़छा - स्वामिन् ! भजन - रस पान करने वाला भक्त रसपान से कभी थकता भी है क्या ? दादूजी ने कहा -
रात माता राम का, मतिवाला मै मंत ।
दादू पीवत क्यों रेह, जे जुग जांहिं अनन्त ॥३२३॥
(परिचय अंग ४)
अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर मांगा दादूजी का शिष्य हो गये थे । ये सौ में हैं ।
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फिर बीसा नाम के व्यक्ति ने पू़छा - स्वामिन् ! साधक की दुविधा कब मिटती है ? दादूजी ने कहा -
आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहिं ।
दादू देखा नैन भर, ताके दुविधा नांहीं ॥३२७॥
(परिचय अंग ४)
बीसा उक्त वचन का आशय समझकर दादूजी का शिष्य हो गया था । ये सौं में हैं ।
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नृसिंहदास ने पू़छा - स्वामिन् ! वृत्ति सत्य ब्रह्म में स्थिर कब होती हैं ? दादूजी ने कहा -
पीवत चेतन जब लगे, तब लग लेवे आय ।
जब माता दादू प्रेमरस, तब काहे को जाय ॥३२८॥
(परिचय अंग ४)
अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर नृसिंहदास दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ में हैं ।
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जगन्नाथ नाम के व्यक्ति ने पू़छा - स्वामिन् ! स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर निर्मल कब होते है ? दादूजी ने कहा -
दादू अन्तर आतमा, पीवे हरि जल नीर ।
सौंज सकल ले उद्धरे, निर्मल होय शरीर ॥३२९॥
(परिचय अंग ४)
उक्त उपदेश के अनुसार जगन्नाथ ने अपने दोनों शरीर साधन द्वारा शुद्ध कर लिये थे । ये दादूजी के शिष्य हो गये थे और सौ शिष्यों में गिने जाते हैं ।
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