#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१७. बिरहनी उलाहने को अंग*
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*हमकौं तौ रैंनि दिन शंक मन मांहि रहै,*
*उनकी तौ बातनि मैं ठीक हूं न पाइये ।*
*कबहूं संदेसौ सुनि अधिक उछाह होइ,*
*कबहूं क रोइ रोइ आंसुनि बहाइये ॥*
*औंरनि कै रस बस होइ रहे प्यारे लाल,*
*आवनि की कहि कहि हम कौं सुनाइये ।*
*सुन्दर कहत ताहि काटिये जु कौंन भाँति,*
*जु तौ रूंख आपनेई हाथ से लगाइये ॥२॥*
मेरे मन में दिन रात यही सन्देह बना रहता है; क्योंकि मुझे उनकी बातों में सत्यता नहीं जान पड़ती ।
कभी उन का सन्देश प्राप्त कर मेरे मन में उत्साह(हर्ष) होता है, कभी उनकी विपरीत बातें सुन कर बहुत देर तक रो रो कर आँसू बहाती रहती हूँ ।
वे मेरे प्राणप्रिय अन्य किसी में आसक्त हो गये हैं, परन्तु हमारे लिये बार बार अपने आने का सन्देश भेज रहे हैं ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - उस(स्नेह रूप) वृक्ष को हम स्वयं कैसे काटें जिस को हमने अपने हाथों से लगाया हो ॥२॥ (विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ।)
(क्रमशः)

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