गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

१७. बिरहनी उलाहने को अंग ~ २

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१७. बिरहनी उलाहने को अंग* 
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*हमकौं तौ रैंनि दिन शंक मन मांहि रहै,*
*उनकी तौ बातनि मैं ठीक हूं न पाइये ।* 
*कबहूं संदेसौ सुनि अधिक उछाह होइ,* 
*कबहूं क रोइ रोइ आंसुनि बहाइये ॥* 
*औंरनि कै रस बस होइ रहे प्यारे लाल,* 
*आवनि की कहि कहि हम कौं सुनाइये ।* 
*सुन्दर कहत ताहि काटिये जु कौंन भाँति,* 
*जु तौ रूंख आपनेई हाथ से लगाइये ॥२॥* 
मेरे मन में दिन रात यही सन्देह बना रहता है; क्योंकि मुझे उनकी बातों में सत्यता नहीं जान पड़ती । 
कभी उन का सन्देश प्राप्त कर मेरे मन में उत्साह(हर्ष) होता है, कभी उनकी विपरीत बातें सुन कर बहुत देर तक रो रो कर आँसू बहाती रहती हूँ । 
वे मेरे प्राणप्रिय अन्य किसी में आसक्त हो गये हैं, परन्तु हमारे लिये बार बार अपने आने का सन्देश भेज रहे हैं । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - उस(स्नेह रूप) वृक्ष को हम स्वयं कैसे काटें जिस को हमने अपने हाथों से लगाया हो ॥२॥ (विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ।)
(क्रमशः)

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