मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

१८. शब्दसार को अंग ~ २

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१८. शब्दसार को अंग* 
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*=इन्दव छंद =*
*पांन उहै जु पीयूष पीवै नित,* 
*दांन उहै जु दरिद्र ही भांनै ।* 
*कांन उहै सुनिये जश केशव,* 
*मांन उहै करिये सनमांनै ॥* 
*तांन उहैं सुलतांन रिझावत,* 
*जांन उहै जगदीश ही जांनै ।* 
*बांन उहै मन बेधत सुन्दर,* 
*ज्ञांन उहै उपजै न अज्ञांनै ॥२॥* 
*कुछ लौकिक शब्दों का वास्तविक अर्थ* : वास्तविक 'पान'(पीना) वही है, जिसमें अमृतरस पीया जाय । इसी तरह 'दान' वही है जिससे दरिद्रता विनष्ट हो सके । 
तथा उसी को वास्तविक 'कर्णेन्द्रिय'(कान) कहा जा सकता है, जिसको प्रभु परमात्मा का निरन्तर गुणगान सुना जाय । एवं 'मान' उसे ही कहते हैं जो दूसरों को भी आदृत(सम्मानित) करना जाने । 
'तान'(संगीत' उसे ही माना जाता है जो राजा(कुशल संगीतज्ञ) को भी मुग्ध कर सके । इसी तरह 'ज्ञान' वही कहा जाता है, जिसके माध्यम से प्रभु परमात्मा का साक्षात्कार हो सके । 
इसी प्रकार 'वाण' उसे ही कहेंगे जिससे प्रत्यक्ष:(सीधे) हृदय पर प्रहार हो । और *श्री सुन्दरदास जी*'ज्ञान' उसे कहते हैं जिसकी प्राप्ति के बाद अज्ञान का आवरण सदा के लिये सर्वथा निवृत्त हो जाए ॥२॥
(क्रमशः)

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