बुधवार, 24 दिसंबर 2014

१७. बिरहनी उलाहने को अंग ~ १

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१७. बिरहनी उलाहने को अंग* 
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*मनहर छंद* 
*पिया को अंदेसौ भारी तोसौं कहौं सुनि प्यारी,* 
*यारी तोरी गये सु तौ अजहं न आये हैं ।* 
*मेरै तौ जीवन - प्रांन निस दिन उहै ध्यांन,* 
*मुख सौं न कहूं आंन, नैंन झर लाये हैं ॥* 
*जब तैं गये बिछोहि कल न परत मोहि,* 
*तातैं हूं पूछत तोहि किन बिरमाये हैं ।* 
*सुन्दर बिरहनि कै सोच सखी बार बार,* 
*हमकौं बिसारि अब कौंन के कहाये हैं ॥१॥* 
*विरहिणी का सखी से संवाद* : हे सखि ! मुझे अपने पति के विषय में सन्देह हो रहा है, वह तुझे सुनाती हूँ, प्रिय सखि ! तूँ भी उसे सुन ले, मेरे पति मुझसे स्नेह सम्बन्ध त्याग कर जब से गये तब से अब तक पुनः घर नहीं लौटे हैं । 
मेरे तो वे ही जीवनदाता एवं प्राणभूत हैं, मुझे दिन रात उन ही का ध्यान रहता है । मैं मुख से भी किसी अन्य पुरुष का नाम नहीं लेती । मैं उनके वियोग में दिन रात रोती रहती हूँ । 
जब से मेरा उन से वियोग हुआ है, मेरे चित्त को उनके दर्शन बिना शान्ति नहीं मिलती । अतः मैं तुझसे पूछती हूँ, तुझे कुछ ज्ञात हो तो मुझे बता कि उन को मेरे विषय में किसने भ्रम में डाल दिया कि वे विलम्ब कर रहे हैं । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - हे सखी ! मुझ विरहिणी को यही चिन्ता बार बार कष्ट दे रही है कि वे(मेरे पति देव) मुझे त्याग कर अब किस अन्य(स्त्री) के पति बन गये हैं ॥१॥
(क्रमशः)

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