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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*कल्याण पट्टण प्रसंग*
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*कल्याण पट्टण प्रसंग*
कल्याण पट्टण में परशुराम नाम के सज्जन ने पू़छा - भगवन् ! निष्कामी भक्त कब तक भजन करता हैं ? तब दादूजी ने कहा -
निकट निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।
दादू पीवे राम रस, निष्कामी निज सेव ॥३१५॥
(परिचय अंग ४)
फिर ये दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ में हैं ।
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बखू नामक व्यक्ति ने पू़छा - स्वामिन् ! वास्तव में भजन - रस पान करने वाले भक्त के क्या लक्षण हैं ? दादूजी ने कहा -
दादू हरि रस पीवतां, कबहु अरुचि न होय ।
पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोय ॥३१७॥
(परिचय अंग ४)
बखू भी अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ में हैं ।
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फिर लधुवनवारी ने पू़छा - स्वामिन् ! व्यक्ति तन तथा घर की लाज कब छोड़ता है ? दादूजी ने कहा -
तन गृह छ़़ाडै लाज पति, जब रस माता होय ।
जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोय ॥३२६॥
(परिचय अंग ४)
फिर लघुवनवारी भी दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ में हैं ।
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फिर चतुरदास लावा ने पू़छा - स्वामिन् ! प्रभु प्रेमियों भजन - रस पान से कब तृप्ति होती है ? तब दादूजी ने कहा -
रोम रोम रस पीजिये, एती रसना होय ।
दादू प्यासा, प्रेम का, यू बिन तृप्ति न होय ॥३२५॥
(परिचय अंग ४)
फिर ये भी दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये दादूजी के सौ शिष्यों में हैं ।
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